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वामपंथी साजिश में पिता -पुत्र संबंध

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#father's day आज की औलादें और आज के पिता दोनो ही गलत राह पर हैं। औलादें पित्र सत्ता को नकारती हैं। यह कम्युनिस्टों द्वारा बनाई गयी शिक्षा नीति का परिणाम है। और पिता पित्र सत्ता का रखवाला बना फिर रहा है। ऐसे मे पिता पुत्र टकराव होना ही है। कोई सामंजस्य नही कोई तालमेल नही। जब इंदिरा गाँधी प्रधान मंत्री बनी तब बहुमत के लिए उन्होने कम्युनिस्टों का सहारा लिया । कम्युनिस्टों ने सत्ता मे भागीदारी करके शिक्षा मंत्रालय की मांग की और हासिल किया। फिर सुरू हुआ इतिहास और भारतीय संस्कारों को बिकृत करने का दौर। कम्युनिस्ट मुसलमान शिक्षा मंत्री की कृपा से अकबर को महान और राणा प्रताप को बिद्रोही लिखा गया। औरंगजेब के कारनामे को छुपा लिया गया और इसलाम को महिमा मंडित किया गया।गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों को किस क्रूरता से मारा गया यह इतिहास से हटा दिया गया।भारत के राजाओं को अयिआस,अत्याचारी,और प्रजा को लूटने वाला लिखा गया तथा दलित पिछडों पर सवर्णों को जुर्म करने वाला बताकर नफरत भरा गया।                 वेद पुराण और रामायण के संस्कारों को दकियानुसी बताया ...

पार्टी समर्थित पत्रकारिता

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पार्टी समर्थक पत्रकार ये बिल्कुल नयी अवधारणा है। कम से कम दस साल पहले तक तो इस तरह घोषित तौर पर पत्रकार पार्टियों का समर्थन नहीं करते थे। अब तो न्यूज चैनल बंट गये हैं। अखबार और पोर्टल बंट गये हैं। नाम लीजिए और जनता समझ जाती है कि ये पत्रकार/चैनल/अखबार/पोर्टल किस पार्टी का समर्थन करेगा।  सब कुछ प्रिडेक्टिबल हो गया है। अगर दस साल पहले तक ऐसा नहीं था तो फिर इन दस सालों में ऐसा क्या हुआ है कि इतना स्पष्ट बंटवारा हो गया है। उसका दो कारण हैं। एक, कांग्रेस का विपक्ष हो जाना और दूसरा साम्यवादियों की मजबूत बौद्धिक लॉबी जिसके सामने कथित राष्ट्रवादी पत्रकार आज भी अपने आपको बौद्धिक रूप से बहुत कमजोर पाते हैं।  केन्द्र में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन था। इसलिए पत्रकारों में भी पक्ष और विपक्ष कांग्रेस के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। लेकिन  कम से कम मैं जब से देख सुन समझ रहा हूं तब से कांग्रेस की नैया डांवाडोल है। १९९५ से लेकर २००४ तक कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। इन दस सालों में जो समाजवादी और राष्ट्रवादी सत्ता में आये उनके दौर में भी पत्रकारिता का ऐसा बंटवारा नहीं हुआ था। पत्रकार राजनीतिक ...

किसान आंदोलन और वामी मानसिकता

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वैश्विक राजनीतिक परिवेश में दुनिया ने जिस तरह से राष्ट्रवाद का दामन थामा है।हिंसक समर्थित विचारधारा के लोगो मे एक अजीब अकुलाहट की स्थिति आ गयी है।उदाहरण के यदि भारत को लिया जाय तो धारा 370 के हटने के बाद जनता  में जिसप्रकार का सकारात्मक माहौल बना। उसके बाद से स्थिति और स्पष्ट दिखाई दे रहा है। नागरिकता संशोधन अधिनियम को आधार बनाकर दिल्ली के शाहीनबाग में जो दुष्प्रयोजित आंदोलन शुरू हुआ उसकी अंतिम परिणीति दिल्ली दंगा के रूप में देश के सामने आया।और उसके साथ जो खुलासे हुए उसने उस हिंसक विचारधारा के वैचारिकी को पुनः उजागर किया।इसके सफलता के बाद विश्व भर में इस वैचारिकी को मनाने बाले लोगो के आर्थिक मदद से शुरू हुआ तथाकथित किसान आंदोलन। मैं इसको तथाकथित इसलिए कह रहा हु की इस आंदोलन में दो प्रवृत्तिया मुख्य रूप से क्रियाशील थी।एक बाहरी प्रवृत्ति जो खुद को गांधी के अहिंसा पे आधारित सत्याग्रह का नाम दे रही थी तो दूसरी और वास्तविक प्रवृत्ति थी वह हिंसक रूप जिसने 26 जनवरी,और टिकरी बार्डर रेप कांड के रूप में अपने को प्रकट किया। दरअसल जिस लड़की का रेप इस हिंसक वैचारिकी के झंडे तले क...

कम्युनिज्म और कोरोना:-छद्मयुद्ध

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कम्युनिज्म और कोरोना दोनो का सम्बंध बाप बेटे का है।एक समाज के लिए घातक है तो दूसरा मानव जाति के लिए।आखिर दोनो की पृष्ठभूमि भी एक खास तरह के मानसिकता से सम्बद्ध है। कोरोना महामारी के वैश्विक पटल पे आने के बाद यह बहस आम हो गया कि कोरोना एक जैविक हथियार है।और यह चीन के वुहान शहर के लैब से निकला है।कोरोना के अनेकों लहरों में उसके स्वरूप का बिकराल होना उपरोक्त मान्यता को प्रमाणित करती है।उसके साथ साथ दुनिया भर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों ने अनेको रिसर्च पेपर के माध्यम से यह पुष्ट कर दिया है की यह कोई आपदा नही बल्कि एक जैविक हथियार है। अब यह समझने की जरूरत है कि एक कम्युनिस्ट देश जो एक तथाकथित यूटोपियन विचार को अपने आधार में स्थापित किया है।उसको ऐसे जैविक हथियार बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?ऐसे कितने और जैविक हथियार बनाये है? हिंसा द्वारा पोषित विचारधारा की उपज यही हो सकता है आज पूरी दुनिया इस बात को देख रही है और समझ रही है।इनका जो सामाजिक समानता की बात है वह लोगो को सिर्फ मूर्ख बनाने के लिए है इनके मूल में तो ऐसी हिंसक प्रवृत्ति है जिसने आज मानवता को एक ऐसी स्थिति में लाके खड़ा क...

कोरोना काल में एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग

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वैश्विक महामारी कोरोना के वैश्विक पटल पे आने के बाद पूरे दुनिया मे अफरातफरी का माहौल हो गया।भारत मे भी देश भर में सम्पूर्ण लॉक डाउन लगा दिया गया तथा उसके साथ अनेक प्रयोग किये गए।जैसे घर पे दीपक जलाना और शाम में घंटी और ताली बजाना।ताकि जो हमारे कोरोना योद्धा थे उनको एक बल मिले की देश के लोग हमारे साथ है।लेकिन इस प्रयोग ने मन के अंदर बहुत जिज्ञासा उत्पन्न किया कि जब पूरा विश्व एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित था,भय का वातावरण व्याप्त था,लोग मानसिक रूप से परेशान थे।इस समय इस तरह के प्रयोग? इस प्रश्न का उत्तर मिला जब मैं हार्वर्ड में प्रकाशित एक लेख पढ़ रहा था जिसमे प्रयोगिक औषधि (plecebo) के बारे में पढ़ा। प्लेसिबो इफेक्ट ऐसी ही एक चिकित्सा पद्धति है जिसमें रोगी को किसी दवा से नहीं बल्कि उसके विश्वास के आधार पर ठीक किया जाता है। प्लेसीबो इफ़ेक्ट व्यक्ति की धारणाओं और अपेक्षाओं के सिद्धांत पर आधारित है। इस चिकित्सा पद्धति का प्रभाव व्यक्ति के मन और उसके शरीर के रिश्ते पर आधारित है। जैसे जैसे मैं इसके मनोवैज्ञानिक प्रयोग को भारतीय संदर्भ में समझने लगा स्थिति और स्पष्ट होती चली गयी।...

बंगाल हिंसा:-एक वैचारिकी

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बंगाल में इस प्रकार की हिंसा कोई नही बल्कि यह बंगाल के राजनैतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और इसको स्थापित करने के पीछे भी वही विचार है जिसने विश्व को राजनैतिक हिंसा का सिद्धांत दिया। इस वैचारिकी के दो मुख्य आधार है राजनैतिक हिंसा और वैचारिक असहिष्णुता। इस वैचारिकी के विज्ञापन का काम इन लोगो का नक्सलवाड़ी का सफल प्रयोग जिसने इनके इस हिंसा आधारित राजनैतिक सिद्धान्त को पूरे विश्व मे विज्ञापित किया।इनके लम्बे कार्यकाल के कारण यह राजनैतिक प्रारूप बंगाल के राजनीतिक का अभिन्न अंग बन गया और इसने अपना पाव लोकसभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव तक फैला लिया। पश्चिम बंगाल देश विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे दौर का गवाह रहा है. विभाजन के बाद पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों के मुद्दे पर भी बंगाल में भारी हिंसा होती रही है. वर्ष 1979 में सुंदरबन इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है. उसके बाद इस इतिहास में ऐसे कई और नए अध्याय जुड़े. दरअसल, साठ के दशक के द्वितीयार्ध...

विषैला वामपंथ:-हिंसा परमो धर्म:

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मेरा निजी अनुभव ये है कि वैचारिक असहिष्णुता सबसे अधिक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों में होती है।  ये लोग अपने अलावा किसी और विचार के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करते। पहले आपकी उपेक्षा करेंगे। फिर आपका उपहास उड़ायेंगे। इतने से भी बात नहीं बनी तो आपके ऊपर कोई न कोई लेबल चिपकाकर भाग जाएंगे।  मेरे कई कम्युनिस्ट मित्र थे। शायद अभी हों भी। लेकिन कुछ में इतनी घोर वैचारिक संकीर्णता दिखी कि एक विपरीत विचार सहन करने की शक्ति नहीं। इतना असहिष्णु व्यक्ति विद्वान कैसे हो सकता है? विपरीत के विचार को सुनना तो विद्वान का पहला लक्षण होता है। असल में बौद्धिकता का विकास ही विपरीत के विचार से होता है।  वरना आप एकरस हो जाते हैं। वैसे भी विचार कभी स्थाई नहीं होते। आज से पांच सात साल पहले का अपना ही लिखा देखता हूं तो विश्वास नहीं होता कि यह मैंने लिखा है। लेकिन वह भी मैं था। और यह भी मैं हूं। विचारों में निरंतर परिवर्तन एक जीवंत व्यक्ति का लक्षण होता है। लेकिन यह लक्षण कम्युनिस्ट विचारकों में कम दिखता है। ऐसा लगता है वो अपने अलावा किसी और विचार को समझना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। ऐसे ल...

युवा लोकतंत्र में युवा सरपंच

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मानव संस्कृति के विकास में लोकतांत्रिक व्यवस्था के संकल्पक को भी शायद यह विश्वास रहा होगा कि राजतंत्रीय व्यवस्था के विकल्प के रूप यह व्यवस्था इतना दीर्घकालिक होगा।वैश्विक फलक पे विश्व के सबसे प्राचीन लोकतंत्र के रूप में अमेरिका और सबसे बड़े लोकतंत्र भारत इसके उदाहरण है।अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मानक मान लिया जाय तो उसके सापेक्ष भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने तरुणाई में है। वैश्विक लोकतंत्र और भारतीय स्वराज के संमिश्रण से उत्पन्न ग्राम स्वराज/ग्राम पंचायत लोकतांत्रिक प्रणाली का वह परिष्कृत स्वरूप है जिसने अपने अंदर गांधी,विनोवा और दिन दयाल जी के' ग्राम केंद्रित शासन प्रणाली' के वैचारिकी का मूर्त रूप दिया है। भारत मे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस वैचारिकी के व्यवहार में आने में लगभग एक दशक का समय लग गया कारण था विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र।यद्दपि ग्राम स्वराज अपने शैशव काल मे अपने मूल्यों को उस रूप में स्थापित नही कर पाया जो उसका मौलिक प्रयोजन था लेकिन आज भारत युवाप्रधान देश है और ग्राम पंचायतों में युवाओं की वर्तमान सहभागिता शुभ संकेत दे रही है कि विश्व के युव...

'आत्मनिर्भर भारत 'एक द्वितीय प्रयोग

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जब से देश में कोरोना ने प्रवेश किया है तब से विकास की गहरी खाई दिन प्रतिदिन दिखाई दे रही है ।जो बिना सूक्ष्मदर्शी दूरदर्शी के दिख रही है ।यह उनको भी दिखाई दे रही है जो देख नहीं पाते , या जानबूझकर देखना नहीं चाहते है ।कुछ भक्त कंपनी के उस चश्में को हटाना ही  नहीं चाहते जिससे कंपनी का चिल्लाता हुआ स्मार्ट डेवलपमेंट सड़क पर दिखे । कोरोना ने दुनियां  को दिखा दिया कि विकास प्राकृतिक स्थायित्त्व समानता लिए हुए होना चाहिए ।अन्यथा छिटक विकास सिर्फ खाइयां पैदा करता है ।जो विपरीत परिस्थितियों महामारियों में  सड़क पर टहलता है ।जो सबके लिए नुकसानदायक है । कोरोना संकटकाल में बेघर मजबूर मजदूर सड़क पर भूखा प्यासा बिलखता हुआ,कोसों दूर अपने घर की राह पकड़ा हुआ है । असल में यह राह कथित  विकास पकड़ा हुआ था जिसने इतनी मजबूरियां पैदा कर दी कि गांधीजी का ग्रामीण विकास उठकर चलकर दौड़कर भागकर शहर आ गया ।जहां इसे ना  शिक्षा,ना स्वास्थ्य ,ना शारीरिक,ना स्थायित्त्व  विकास  का ख्याल रहा ,यहां तो यह सिर्फ दो वक्त की रोटी पर सिमटा हुआ है।आज जब  इसकी रोटी पर कोरोना का कब्जा हो ...

अवधारणा, नैरेटिव और अनुवाद

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आंदोलन,हिंसा और सरकार

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सरकार किसी की भी हो आंदोलनों से निपटने का तरीका एक होता है। आंदोलन के बीच फूट पैदा करो और उन्हें हिंसा के लिए उकसाओ। ये तरीका संभवत: ब्रिटिश नौकरशाही ने शुरु किया था जिसे भारत सरकार की नौकरशाही जस का तस इस्तेमाल करती है। जो भी सरकार होती है उसे हिंसा पसंद होती है। क्योंकि हिंसा ही वह रास्ता है जिसके बहाने सरकारें आंदोलनों का दमन करती हैं। अगर किसी आंदोलन में हिंसा न हो तो हो सकता है सरकार उसमें हिंसा पैदा करने का उपाय भी कर दे। ब्रिटेन में रहने दौरान गांधी जी ये बात समझ चुके थे इसलिए उन्होंने अहिंसा का रास्ता चुना। ये एक ऐसा हथियार था जिसके सामने ब्रिटिश सरकार बेबस हो गयी। बीते दो दशक में मैने जितने आंदोलन देखे हैं अंतत: वो हिंसा पर आकर ही समाप्त होते हैं। आंदोलन जब तक अहिंसक होता है, सरकारें चाहकर भी कुछ नहीं कर पातीं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता के शिखर पर मनमोहन बैठे हैं या मोदी। नौकरशाही वही रहती है और उसके जन आंदोलन विरोधी हथकंडे भी लगभग एक जैसे ही होते हैं। याद करिए 2012 का निर्भया आंदोलन। कैसे उसे इंडिया गेट पर खत्म किया गया था। जब नौकरशाही को लगा कि अब इन नौजव...