अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन भू-आकृतिक संरचनाओं में से एक है, जो केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिकी, जल-सुरक्षा, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन की रीढ़ है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली अरावली शृंखला ऐतिहासिक रूप से मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल को पुनर्भरण देने और जैविक जीवन को संरक्षण प्रदान करने का कार्य करती रही है। ऐसे में हाल के वर्षों में सरकार द्वारा अरावली के संदर्भ में उठाए गए कदम केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक प्रश्न भी खड़े करते हैं। सरकारी नीतियों का मूल दावा यह रहा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधना आवश्यक है। इसी तर्क के आधार पर खनन गतिविधियों, रियल एस्टेट परियोजनाओं, सड़क-निर्माण और औद्योगिक विस्तार को वैधता प्रदान की गई। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह संतुलन वास्तव में साधा गया है, या विकास की भाषा में पर्यावरणीय विनाश को वैचारिक वैधता दी जा रही है। अरावली के संदर्भ में सरकार के अनेक कदम पर्यावरणीय चेतना की बजाय अर्थनीतिक प्राथमिकताओं से संचालित दिखाई देते हैं। खनन नीति ...
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