भारतीय जाति व्यवस्था में उत्पादकता
भार जातिवाद और भेद भाव जो भारत के अतीत का कटु सत्य है और इसको स्वीकार करने में किसी को कोई परहेज नही होना चाहिए।लेकिन इसके साथ यह भी स्वीकार करना चाहिए कि भारत मे सहअस्तित्व की भावना अन्य महाद्वीप के देशों से ज्यादा है।यही कारण है कि इतनी तथाकथित भेदभाव वाली व्यवस्था भी इतने लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाये रखने में सफल हुई।लेकिन वर्तमान में जातिगत भेदभाव अपराध है और इसका पूर्ण विरोध होना चाहिए।इसकी पूर्ण समाप्ति केलिए आपसी सामाजिक स्वीकार्यता और उच्च नीच की भावना का त्याग होना चाहिए । कुछ अपवाद की घटनाओं को छोड़ दे तो हमारा समाज इस दिशा में काफी तेजी से बढ़ रहा है।यह सर्वविदित है । लेकिन किसी भी घृणित अतीत से बेहतर भविष्य के ओर बढ़ने का एक माध्यम यह हो सकता है कि हम उसपर विमर्श त्याग दे।लेकिन आजकल साहित्य और अभिनय के माध्यम से उस घृणित परिवेश के चित्रण हमारे मंसूबो पे प्रश्न खड़ा कर रहा है।कि हम भविष्य का निर्माण किस आधार पे करना चाह रहे है?समाज के एक खास वर्ग के लोग इस अतित के परिवेश को लेकर एक पूर्वाग्रह बना लिए है और यह मानव स्वभाव है कि हम किसी के लिए एक धारणा बना लेते हैं , फिर उस...