भारतीय संस्कृति मे सामाजिक समरसता, नैतिक श्रेष्ठता और लोकमंगल की भावना
आज प्रातः मैं गांव की ओर यात्रा कर रहा था। मार्ग में पीपल के वृक्षों के आसपास बड़ी संख्या में महिलाओं की भीड़ दिखाई दी। वे श्रद्धापूर्वक पीपल वृक्ष की परिक्रमा कर रही थीं, पूजा-अर्चना कर रही थीं और व्रत का पालन कर रही थीं। इस दृश्य ने मेरे मन में जिज्ञासा उत्पन्न की। घर पहुंचने पर मैंने माता जी से पूछा—“आज आप लोगों ने जो व्रत किया है, उसका कथानक, लक्ष्य और उद्देश्य क्या है?” इस पर माता जी ने सोमवती अमावस्या से जुड़ी एक लोककथा सुनाई। उस कथा को सुनने के बाद मैं भारतीय संस्कृति के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक सत्य पर विचार करने लगा। लोककथाओं के अनुसार एक राजा की पुत्री के जीवन में वैधव्य का संकट उपस्थित था। विद्वानों और ज्योतिषियों ने बताया कि उसका सौभाग्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब उसे एक ऐसी पुण्यवती स्त्री का आशीर्वाद प्राप्त हो, जिसके तप, सेवा और पतिव्रत की शक्ति असाधारण हो। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि ऐसी शक्ति किसी राजमहल या कुलीन परिवार में नहीं, बल्कि एक साधारण धोबिन स्त्री में विद्यमान है। राजा की पुत्री ने उस धोबिन की सेवा की और अंततः उसी के पुण्यबल और आश...