कोरोना काल में एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग
वैश्विक महामारी कोरोना के वैश्विक पटल पे आने के बाद पूरे दुनिया मे अफरातफरी का माहौल हो गया।भारत मे भी देश भर में सम्पूर्ण लॉक डाउन लगा दिया गया तथा उसके साथ अनेक प्रयोग किये गए।जैसे घर पे दीपक जलाना और शाम में घंटी और ताली बजाना।ताकि जो हमारे कोरोना योद्धा थे उनको एक बल मिले की देश के लोग हमारे साथ है।लेकिन इस प्रयोग ने मन के अंदर बहुत जिज्ञासा उत्पन्न किया कि जब पूरा विश्व एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित था,भय का वातावरण व्याप्त था,लोग मानसिक रूप से परेशान थे।इस समय इस तरह के प्रयोग? इस प्रश्न का उत्तर मिला जब मैं हार्वर्ड में प्रकाशित एक लेख पढ़ रहा था जिसमे प्रयोगिक औषधि (plecebo) के बारे में पढ़ा। प्लेसिबो इफेक्ट ऐसी ही एक चिकित्सा पद्धति है जिसमें रोगी को किसी दवा से नहीं बल्कि उसके विश्वास के आधार पर ठीक किया जाता है। प्लेसीबो इफ़ेक्ट व्यक्ति की धारणाओं और अपेक्षाओं के सिद्धांत पर आधारित है। इस चिकित्सा पद्धति का प्रभाव व्यक्ति के मन और उसके शरीर के रिश्ते पर आधारित है। जैसे जैसे मैं इसके मनोवैज्ञानिक प्रयोग को भारतीय संदर्भ में समझने लगा स्थिति और स्पष्ट होती चली गयी।...