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दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संस्कृति की नींव और राष्ट्र का पुनर्निर्माण

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आज का दिन भारतीय राष्ट्रचिंतन की एक अद्भुत निरंतरता को स्मरण करने का अवसर है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी—दोनों का जन्मदिवस—केवल दो महान व्यक्तियों का स्मरण नहीं है, बल्कि भारत की उस अखंड यात्रा को समझने का अवसर है, जिसमें राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एक ही सांस्कृतिक धारा के दो पड़ाव प्रतीत होते हैं। उनके जीवन को एक साथ देखकर ऐसा लगता है मानो इतिहास ने स्वयं अपनी मशाल एक हाथ से दूसरे हाथ में सौंप दी हो।मालवीय जी का जीवन औपनिवेशिक भारत की पीड़ा, अपमान और आत्मग्लानि के बीच राष्ट्र के आत्मसम्मान को जगाने का प्रयास था। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और नैतिकता से अनुप्राणित साधना माना। शिक्षा, पत्रकारिता, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना—इन सभी क्षेत्रों में उनका योगदान इस बात का प्रमाण है कि वे स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखते थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना केवल एक विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं थी, बल्कि यह उस भारत की कल्पन...

खुदा और गॉड के बीच गायब भारतीय ईश्वर..

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सौरभ द्विवेदी द्वारा The Lallantop पर आयोजित जावेद अख्तर और मौलाना के बीच “क्या ईश्वर का अस्तित्व है” विषयक कार्यक्रम को यदि भारतीय परंपरा के आलोक में देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कार्यक्रम संवाद कम और मत-प्रस्तुति अधिक था। भारतीय परंपरा में संवाद का अर्थ केवल दो व्यक्तियों का आमने-सामने बोलना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज के लिए साझा बौद्धिक धरातल, तर्क की स्वीकृत पद्धति और प्रतिपक्ष की बात को गंभीरता से ग्रहण करने की नैतिक तैयारी आवश्यक मानी जाती है। इस दृष्टि से यह कार्यक्रम भारतीय संवाद-परंपरा से बाहर खड़ा दिखाई देता है।इस कार्यक्रम में एक ओर Javed Akhtar थे, जिनका ईश्वर-विषयक दृष्टिकोण आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और मूलतः पश्चिमी तर्कवाद से प्रभावित है, और दूसरी ओर मौलाना थे, जिनका चिंतन इस्लामी धार्मिक आस्था की सीमाओं के भीतर संचालित था। दोनों के बीच न तो दार्शनिक शब्दावली साझा थी और न ही ज्ञानमीमांसा की समान पृष्ठभूमि। परिणामस्वरूप यह बहस भारतीय अर्थों में न तो शास्त्रार्थ थी, न वाद, न संवाद।एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी चर्चा में “खुदा” और “गॉड” की अवधा...

अरावली पहाड़ का पक्ष 🌍

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अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन भू-आकृतिक संरचनाओं में से एक है, जो केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिकी, जल-सुरक्षा, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन की रीढ़ है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली अरावली शृंखला ऐतिहासिक रूप से मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल को पुनर्भरण देने और जैविक जीवन को संरक्षण प्रदान करने का कार्य करती रही है। ऐसे में हाल के वर्षों में सरकार द्वारा अरावली के संदर्भ में उठाए गए कदम केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक प्रश्न भी खड़े करते हैं। सरकारी नीतियों का मूल दावा यह रहा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधना आवश्यक है। इसी तर्क के आधार पर खनन गतिविधियों, रियल एस्टेट परियोजनाओं, सड़क-निर्माण और औद्योगिक विस्तार को वैधता प्रदान की गई। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह संतुलन वास्तव में साधा गया है, या विकास की भाषा में पर्यावरणीय विनाश को वैचारिक वैधता दी जा रही है। अरावली के संदर्भ में सरकार के अनेक कदम पर्यावरणीय चेतना की बजाय अर्थनीतिक प्राथमिकताओं से संचालित दिखाई देते हैं। खनन नीति ...