खुदा और गॉड के बीच गायब भारतीय ईश्वर..



सौरभ द्विवेदी द्वारा The Lallantop पर आयोजित जावेद अख्तर और मौलाना के बीच “क्या ईश्वर का अस्तित्व है” विषयक कार्यक्रम को यदि भारतीय परंपरा के आलोक में देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कार्यक्रम संवाद कम और मत-प्रस्तुति अधिक था। भारतीय परंपरा में संवाद का अर्थ केवल दो व्यक्तियों का आमने-सामने बोलना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज के लिए साझा बौद्धिक धरातल, तर्क की स्वीकृत पद्धति और प्रतिपक्ष की बात को गंभीरता से ग्रहण करने की नैतिक तैयारी आवश्यक मानी जाती है। इस दृष्टि से यह कार्यक्रम भारतीय संवाद-परंपरा से बाहर खड़ा दिखाई देता है।इस कार्यक्रम में एक ओर Javed Akhtar थे, जिनका ईश्वर-विषयक दृष्टिकोण आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और मूलतः पश्चिमी तर्कवाद से प्रभावित है, और दूसरी ओर मौलाना थे, जिनका चिंतन इस्लामी धार्मिक आस्था की सीमाओं के भीतर संचालित था। दोनों के बीच न तो दार्शनिक शब्दावली साझा थी और न ही ज्ञानमीमांसा की समान पृष्ठभूमि। परिणामस्वरूप यह बहस भारतीय अर्थों में न तो शास्त्रार्थ थी, न वाद, न संवाद।एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी चर्चा में “खुदा” और “गॉड” की अवधारणाएँ केंद्रीय थीं, जबकि ये दोनों ही संकल्पनाएँ भारतीय दर्शन की मूल अवधारणाएँ नहीं हैं। भारतीय परंपरा में ईश्वर को किसी एक सर्वशक्तिमान, बाह्य नियंता सत्ता के रूप में अनिवार्यतः नहीं देखा गया। यहाँ ईश्वर, ब्रह्म, आत्मा, पुरुष, ईश्वर, ईश, तत्त्व, या सत्य—ये सभी अवधारणाएँ बहुविध और बहुस्तरीय हैं। भारतीय दर्शन में प्रश्न यह नहीं रहा कि “ईश्वर है या नहीं”, बल्कि यह रहा है कि “यथार्थ का अंतिम स्वरूप क्या है” और “मनुष्य का उससे संबंध कैसा है”।
इस दृष्टि से देखें तो यह बहस भारतीय दर्शन को पूरी तरह अनुपस्थित कर देती है। न वेदांत का ब्रह्म यहाँ था, न सांख्य का पुरुष, न न्याय का ईश्वर-सिद्धि का तर्क, न मीमांसा का ईश्वर-निरपेक्ष कर्म-सिद्धांत, और न ही बौद्ध-चार्वाक की सुव्यवस्थित नास्तिकता। यह बहस मूलतः इस्लाम का एक आंतरिक संवाद थी, जिसमें एक ओर आस्था की परंपरा थी और दूसरी ओर उसी परंपरा के भीतर से उठी आधुनिक आलोचना।यहाँ एक गहरी ऐतिहासिक संभावना भी छिपी है। यदि इस्लामी परंपरा में पैगंबर Muhammad के बाद समय-समय पर इस प्रकार के आंतरिक बौद्धिक संवाद, तर्कपूर्ण प्रश्न और दार्शनिक बहसें जीवित रहतीं, तो संभव है कि इस्लामी चिंतन में वह कठोरता और कट्टरता विकसित न होती, जो आज कई रूपों में दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में दर्शन इसलिए जीवित रहा क्योंकि वहाँ आस्तिक और नास्तिक, दोनों को एक साथ सोचने का स्थान मिला।भारतीय दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के अनेक तर्क दिए गए हैं, किंतु वे सभी किसी एक रूप में ईश्वर को थोपने के प्रयास नहीं हैं। न्याय दर्शन कारण-कार्य सिद्धांत के आधार पर ईश्वर की आवश्यकता मानता है—सृष्टि की व्यवस्था, नैतिक नियम और कर्म-फल का संतुलन किसी चेतन नियामक की ओर संकेत करता है। वेदांत में ईश्वर की सिद्धि तर्क से अधिक अनुभूति और आत्मबोध के माध्यम से होती है—ब्रह्म कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार है। सांख्य दर्शन ईश्वर को अस्वीकार करते हुए भी गहरे आध्यात्मिक जीवन का मार्ग देता है, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय परंपरा में ईश्वर की अस्वीकृति भी अधार्मिकता नहीं मानी गई।यहाँ तक कि चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन भी ईश्वर के निषेध को हल्के मज़ाक या भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित भौतिकवादी दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करते हैं। बौद्ध दर्शन में ईश्वर की अनुपस्थिति के बावजूद करुणा, नैतिकता और दुःख-निवारण का एक अत्यंत गंभीर तंत्र विकसित होता है। यह सब दर्शाता है कि भारतीय दर्शन में ईश्वर का प्रश्न कभी भी “हाँ या ना” में सीमित नहीं रहा।
लल्लनटॉप की यह बहस इसलिए अधूरी लगती है क्योंकि यह ईश्वर को केवल आस्था बनाम नकार के रूप में प्रस्तुत करती है। भारतीय दृष्टि में ईश्वर न तो केवल विश्वास का विषय है और न केवल तर्क का, बल्कि जीवन-अनुभव, साधना और आत्मान्वेषण का परिणाम है। यहाँ ईश्वर पर प्रश्न करना भी आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा है, और ईश्वर को न मानना भी एक दार्शनिक विकल्प।इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यह कार्यक्रम भारतीय समाज के लिए एक अवसर था—यदि उसमें भारतीय चिंतन को स्थान दिया जाता। तब यह केवल एक मीडिया-डिबेट न रहकर एक गहरा बौद्धिक संवाद बन सकता था। फिर भी, इसका महत्व इस अर्थ में है कि इसने यह दिखा दिया कि बिना जीवित संवाद-परंपरा के कोई भी धर्म या विचार-प्रणाली अंततः जड़ हो जाती है। भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी शक्ति यही रही है कि उसने प्रश्नों से कभी भय नहीं खाया, और शायद आज भी वही दृष्टि सबसे अधिक प्रासंगिक है
डॉ रजनीश मिश्र 
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद 
शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

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