एशिया मे अशांति के पीछे कौन?


एशिया के कई देशों में बीते कुछ वर्षों में जो घटनाएं घट रही हैं, वे यह संकेत दे रही हैं कि महाद्वीप की राजनीतिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने के लिए एक सुनियोजित वैश्विक रणनीति काम कर रही है। हाल ही में नेपाल में बड़े पैमाने पर हुए जनआंदोलन और संसद भवन में आगजनी जैसी घटनाओं के बाद वहां के प्रधानमंत्री ने अपने सांसदों के साथ इस्तीफा दे दिया। यह मात्र एक आंतरिक राजनीतिक संकट का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे स्तर पर चल रही “डीप स्टेट” की गतिविधियों का भी संकेत मिलता है। डीप स्टेट का आशय ऐसी शक्तियों से है जो औपचारिक लोकतांत्रिक तंत्र से बाहर रहकर पर्दे के पीछे से राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावित करती हैं। यह शक्तियाँ कभी वित्तीय संस्थानों के माध्यम से, कभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मीडिया के जरिए, तो कभी स्थानीय असंतोष को उकसाकर अपनी रणनीति को लागू करती हैं।
नेपाल में जो आंदोलन देखने को मिला, उसमें आर्थिक असंतोष, राजनीतिक अव्यवस्था और जातीय-क्षेत्रीय तनाव की भूमिका तो है, परंतु इसे हिंसक रूप देने और इसे संसद भवन तक पहुंचाने में बाहरी शक्तियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। इससे पहले श्रीलंका में आर्थिक संकट के दौरान जिस प्रकार राष्ट्रपति भवन और संसद पर हमला हुआ और तत्कालीन सरकार को हटना पड़ा, वह भी इसी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा प्रतीत होता है। बांग्लादेश में भी हाल ही में छात्र-आंदोलन और विपक्षी दलों की लामबंदी ने लोकतांत्रिक सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की। पाकिस्तान में सैन्य और राजनीतिक अस्थिरता, न्यायपालिका और सरकार के बीच संघर्ष, और बार-बार होने वाले हिंसक प्रदर्शनों का स्वरूप भी इसी श्रेणी में आता है।
इन सभी घटनाओं में एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है—हिंसक भीड़, आर्थिक कठिनाइयों का राजनीतिकरण, सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा, और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सीधे हमले। यह कोई साधारण संयोग नहीं है कि एशिया के कई देशों में लगभग एक ही समय में इस तरह की घटनाएँ उभर रही हैं। इसके पीछे “डीप स्टेट” नामक वह नेटवर्क सक्रिय है, जो एशिया को राजनीतिक रूप से अस्थिर कर अपने रणनीतिक और आर्थिक हित साधना चाहता है। डीप स्टेट का मकसद किसी भी देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से जनता का भरोसा तोड़ना और अराजकता फैलाना होता है, ताकि वहां विदेशी हस्तक्षेप को उचित ठहराया जा सके।
श्रीलंका का उदाहरण लें तो यह देश लंबे समय से आर्थिक संकट झेल रहा था, परंतु जनता का गुस्सा जिस तरह संगठित रूप से अचानक सड़कों पर आया और सत्ता परिवर्तन को मजबूर किया गया, वह स्वाभाविक नहीं था। इसी तरह बांग्लादेश में हाल के प्रदर्शनों ने साफ कर दिया कि आंतरिक असंतोष को बाहरी ताकतों ने हवा दी और उसे एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप दिया। पाकिस्तान तो पहले से ही राजनीतिक और सैन्य संघर्षों का शिकार है, परंतु वहां जिस प्रकार न्यायपालिका, मीडिया और सड़कों पर संघर्ष एक साथ प्रकट हुए, वह डीप स्टेट की रणनीति का ही हिस्सा माना जा सकता है।
अब नेपाल में संसद भवन तक आगजनी पहुंचना और प्रधानमंत्री के साथ सांसदों का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सीधे-सीधे चुनौती दी गई है। नेपाल चीन और भारत दोनों के बीच सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि नेपाल की व्यवस्था अस्थिर होती है तो इसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ना निश्चित है।
इन घटनाओं का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि भारत भी इसका अगला निशाना हो सकता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की स्थिरता वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए अहम है। यदि भारत में भी इसी प्रकार के हिंसक आंदोलनों को जन्म दिया गया, तो यह न केवल आंतरिक अस्थिरता लाएगा बल्कि पड़ोसी देशों के लिए भी खतरा बनेगा। भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए बाहरी ताकतें छोटे-छोटे मुद्दों को बड़ा बनाकर जनआंदोलन खड़ा कर सकती हैं। जातीय, धार्मिक और भाषाई आधार पर समाज को बांटने की कोशिशें पहले से होती रही हैं, और डीप स्टेट इन्हीं कमजोरियों को हथियार बना सकता है।
भारत में बीते वर्षों में किसानों का आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध, और विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों ने यह संकेत दिया कि किस तरह वैश्विक मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं स्थानीय घटनाओं को विश्वस्तरीय मुद्दा बनाकर सरकारों पर दबाव बनाने का काम करती हैं। ये आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा जरूर हैं, परंतु इन्हें हिंसक और अराजक दिशा देने की कोशिशें स्पष्ट दिखाई देती रही हैं।
डीप स्टेट का असली खतरा यही है कि यह सीधे युद्ध या सैन्य हस्तक्षेप की जगह लोकतंत्र और जनता की आवाज का इस्तेमाल कर सत्ता परिवर्तन कराता है। यह प्रक्रिया बाहर से लोकतांत्रिक लगती है, परंतु भीतर से यह योजनाबद्ध और नियंत्रित होती है। जनता को लगता है कि वह अपनी मांगों के लिए लड़ रही है, परंतु वास्तव में वह किसी बड़े वैश्विक एजेंडे का हिस्सा बन चुकी होती है।
भारत के लिए यह स्थिति गंभीर चेतावनी है। यदि नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में एक ही प्रकार की अस्थिरता फैलाई जा सकती है तो भारत में भी इसकी कोशिशें होंगी। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, जनता में राजनीतिक शिक्षा का विस्तार करना, और मीडिया व सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली भ्रामक सूचनाओं का समय रहते खंडन करना इस खतरे से बचने के लिए आवश्यक है।
आज जब नेपाल के प्रधानमंत्री को अपने सांसदों के साथ इस्तीफा देना पड़ा है, तो यह केवल नेपाल की आंतरिक समस्या नहीं है। यह दक्षिण एशिया के भविष्य की स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती है। यदि इन घटनाओं के पीछे छिपे डीप स्टेट के हाथों को पहचाना नहीं गया और समय रहते रोकथाम के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले समय में भारत समेत पूरे एशिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बार-बार संकट में पड़ेंगी। लोकतंत्र को बचाने के लिए केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मूल्यों, संस्थाओं और जनता के विश्वास को सुरक्षित करना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
इसलिए वर्तमान परिस्थितियाँ हमें यह समझने पर मजबूर करती हैं कि एशिया में जो आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे हैं, वे केवल स्थानीय असंतोष का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वैश्विक खेल का हिस्सा हैं। इस खेल का अगला निशाना भारत हो सकता है और इस संभावना को गंभीरता से लेते हुए भारत को अपने लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत, लचीला और जनता से जुड़े रखने की आवश्यकता है। यही एकमात्र उपाय है जिससे डीप स्टेट की चालों को विफल किया जा सकता है और एशिया को एक स्थिर भविष्य प्रदान किया जा सकता है।
डॉ रजनीश मिश्र 
ICPR, New Delhi 

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