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पार्टी समर्थित पत्रकारिता

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पार्टी समर्थक पत्रकार ये बिल्कुल नयी अवधारणा है। कम से कम दस साल पहले तक तो इस तरह घोषित तौर पर पत्रकार पार्टियों का समर्थन नहीं करते थे। अब तो न्यूज चैनल बंट गये हैं। अखबार और पोर्टल बंट गये हैं। नाम लीजिए और जनता समझ जाती है कि ये पत्रकार/चैनल/अखबार/पोर्टल किस पार्टी का समर्थन करेगा।  सब कुछ प्रिडेक्टिबल हो गया है। अगर दस साल पहले तक ऐसा नहीं था तो फिर इन दस सालों में ऐसा क्या हुआ है कि इतना स्पष्ट बंटवारा हो गया है। उसका दो कारण हैं। एक, कांग्रेस का विपक्ष हो जाना और दूसरा साम्यवादियों की मजबूत बौद्धिक लॉबी जिसके सामने कथित राष्ट्रवादी पत्रकार आज भी अपने आपको बौद्धिक रूप से बहुत कमजोर पाते हैं।  केन्द्र में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन था। इसलिए पत्रकारों में भी पक्ष और विपक्ष कांग्रेस के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। लेकिन  कम से कम मैं जब से देख सुन समझ रहा हूं तब से कांग्रेस की नैया डांवाडोल है। १९९५ से लेकर २००४ तक कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। इन दस सालों में जो समाजवादी और राष्ट्रवादी सत्ता में आये उनके दौर में भी पत्रकारिता का ऐसा बंटवारा नहीं हुआ था। पत्रकार राजनीतिक ...