सभ्यता मूलक और संस्कृति मूलक विकास
संस्कृति और सभ्यता के संबंध में विचार करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ये दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के पर्याय की तरह उपयोग में लाए जाते हैं, किंतु वास्तव में इनके अर्थ, स्वरूप और प्रभाव की दिशा बिल्कुल भिन्न होती है। सभ्यता जहाँ मनुष्य के बाह्य जीवन की व्यवस्था, तकनीकी प्रगति, भौतिक साधनों और सामाजिक संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं संस्कृति मनुष्य के आंतरिक जीवन, उसके मूल्यबोध, आचार-विचार, नैतिक चेतना और आत्मिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। यदि सरल भाषा में कहा जाए तो सभ्यता शरीर है और संस्कृति आत्मा। शरीर परिवर्तनशील है, नश्वर है, समय के साथ बदलता रहता है; किंतु आत्मा शाश्वत है, अविनाशी है और काल की सीमाओं से परे है। सभ्यता का निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं से होता है—भोजन, वस्त्र, आवास, परिवहन, संचार, विज्ञान, तकनीक आदि। ये सभी साधन जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए विकसित किए जाते हैं। इसलिए सभ्यता का स्वरूप समय-समय पर बदलता रहता है। आज जो सभ्यता आधुनिक मानी जाती है, वह कल प्राचीन हो जाएगी। उदाहरण के लिए, आज का डिजिटल युग कल किसी और उन्नत तकनीकी व्यवस्था में परिव...