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विषैला वामपंथ:-हिंसा परमो धर्म:

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मेरा निजी अनुभव ये है कि वैचारिक असहिष्णुता सबसे अधिक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों में होती है।  ये लोग अपने अलावा किसी और विचार के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करते। पहले आपकी उपेक्षा करेंगे। फिर आपका उपहास उड़ायेंगे। इतने से भी बात नहीं बनी तो आपके ऊपर कोई न कोई लेबल चिपकाकर भाग जाएंगे।  मेरे कई कम्युनिस्ट मित्र थे। शायद अभी हों भी। लेकिन कुछ में इतनी घोर वैचारिक संकीर्णता दिखी कि एक विपरीत विचार सहन करने की शक्ति नहीं। इतना असहिष्णु व्यक्ति विद्वान कैसे हो सकता है? विपरीत के विचार को सुनना तो विद्वान का पहला लक्षण होता है। असल में बौद्धिकता का विकास ही विपरीत के विचार से होता है।  वरना आप एकरस हो जाते हैं। वैसे भी विचार कभी स्थाई नहीं होते। आज से पांच सात साल पहले का अपना ही लिखा देखता हूं तो विश्वास नहीं होता कि यह मैंने लिखा है। लेकिन वह भी मैं था। और यह भी मैं हूं। विचारों में निरंतर परिवर्तन एक जीवंत व्यक्ति का लक्षण होता है। लेकिन यह लक्षण कम्युनिस्ट विचारकों में कम दिखता है। ऐसा लगता है वो अपने अलावा किसी और विचार को समझना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। ऐसे ल...