निंदा नूपुर शर्मा की नही ब्लॉसफ़ेमी क़ानून की होनी चाहिए
आपने कभी सोचा है कि जब कोई मुस्लिम बहुल देश अपने आप को इस्लामिक स्टेट घोषित करता है तो सबसे पहले नबी निंदा कानून (ब्लासफेमी लॉ) क्यों बनाता है? उस कानून के तहत अल्लाह, कुरान और पैगंबर के खिलाफ अपमानजक टिप्पणी करने पर मौत की सजा क्यों निर्धारित करता है? क्या इन तीनों में कोई कमी है जिसकी आलोचना का डर हर मुस्लिम स्टेट को सताता रहता है? या फिर वह किसी कीमत पर अपनी आस्था पर चोट बर्दाश्त नहीं करना चाहता? ब्लासफेमी लॉ भारत में अंग्रेजों ने बनाया था। 1920 से 1922 के बीच लाहौर में तीन अलग अलग बुकलेट छापी गयीं। इनके नाम थे, "कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी", "सीता एक छिनाला" और "उन्नीसवीं सदी का एक लंपट महर्षि"। इन किताबों में न केवल हिन्दू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया था बल्कि आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद को भी निशाना बनाया गया था। इन किताबों के लेखक और प्रकाशक अनाम थे। इसकी प्रतिक्रिया में एक आर्यसमाजी चमूपति शास्त्री ने रंगीला रसूल नामक एक किताब लिखी जो मुसलमानों के पैगंबर के बारे में थी। इस किताब को एक दूसरे आर्यसमाजी प्रकाशक महाशय राजपाल ने...