संदेश

मई 4, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बंगाल हिंसा:-एक वैचारिकी

चित्र
बंगाल में इस प्रकार की हिंसा कोई नही बल्कि यह बंगाल के राजनैतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और इसको स्थापित करने के पीछे भी वही विचार है जिसने विश्व को राजनैतिक हिंसा का सिद्धांत दिया। इस वैचारिकी के दो मुख्य आधार है राजनैतिक हिंसा और वैचारिक असहिष्णुता। इस वैचारिकी के विज्ञापन का काम इन लोगो का नक्सलवाड़ी का सफल प्रयोग जिसने इनके इस हिंसा आधारित राजनैतिक सिद्धान्त को पूरे विश्व मे विज्ञापित किया।इनके लम्बे कार्यकाल के कारण यह राजनैतिक प्रारूप बंगाल के राजनीतिक का अभिन्न अंग बन गया और इसने अपना पाव लोकसभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव तक फैला लिया। पश्चिम बंगाल देश विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे दौर का गवाह रहा है. विभाजन के बाद पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों के मुद्दे पर भी बंगाल में भारी हिंसा होती रही है. वर्ष 1979 में सुंदरबन इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है. उसके बाद इस इतिहास में ऐसे कई और नए अध्याय जुड़े. दरअसल, साठ के दशक के द्वितीयार्ध...