बंगाल हिंसा:-एक वैचारिकी


बंगाल में इस प्रकार की हिंसा कोई नही बल्कि यह बंगाल के राजनैतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और इसको स्थापित करने के पीछे भी वही विचार है जिसने विश्व को राजनैतिक हिंसा का सिद्धांत दिया।
इस वैचारिकी के दो मुख्य आधार है राजनैतिक हिंसा और वैचारिक असहिष्णुता।
इस वैचारिकी के विज्ञापन का काम इन लोगो का नक्सलवाड़ी का सफल प्रयोग जिसने इनके इस हिंसा आधारित राजनैतिक सिद्धान्त को पूरे विश्व मे विज्ञापित किया।इनके लम्बे कार्यकाल के कारण यह राजनैतिक प्रारूप बंगाल के राजनीतिक का अभिन्न अंग बन गया और इसने अपना पाव लोकसभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव तक फैला लिया।

पश्चिम बंगाल देश विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे दौर का गवाह रहा है. विभाजन के बाद पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों के मुद्दे पर भी बंगाल में भारी हिंसा होती रही है. वर्ष 1979 में सुंदरबन इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है. उसके बाद इस इतिहास में ऐसे कई और नए अध्याय जुड़े. दरअसल, साठ के दशक के द्वितीयार्ध में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया था.
सत्तर के दशक में भी वोटरों को आतंकित कर अपने पाले में करने और सीपीएम की पकड़ मजबूत करने के लिए बंगाल में हिंसा होती रही है.

लेफ्ट के सत्ता में आने के बाद कोई एक दशक तक राजनीतिक हिंसा का दौर चलता रहा था.बाद में विपक्षी कांग्रेस के कमजोर पड़ने की वजह से टकराव धीरे-धीरे कम हो गया था. लेकिन वर्ष 1998 में ममता बनर्जी की ओर से टीएमसी के गठन के बाद वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसा का नया दौर शुरू किया. उसी साल हुए पंचायत चुनावों के दौरान कई इलाकों में भारी हिंसा हुई. उसके बाद राज्य के विभिन्न इलाकों में जमीन अधिग्रहण समेत विभिन्न मुद्दों पर होने वाले आंदोलनों और माओवादियों की बढ़ती सक्रियता की वजह से भी हिंसा को बढ़ावा मिला. उस दौरान ममता बनर्जी जिस स्थिति में थीं अब उसी स्थिति में बीजेपी है. नतीजतन टकराव लगातार तेज हो रहा है.
राष्ट्रवादी चिंतक गोपाल कृष्ण गोखले ने बंगाल के विषय मे कहा था कि "what bangal thinks today India thinks tomorrow ".बंगाल ने इस कथन को हमेशा चरितार्थ किया है भारतीय राजनैतिक चिंतन में वामपंथ के संस्थापक M N Roy को माना जाता है जहाँ से इस बिघटन कारी राजनीतिक चिंतन का भारत मे प्रवेश हुआ ।अर्थात बंगाल ने ही इस उन्मादी विचार को स्वीकार्यता दी।और आज इस वैचारिकी के वास्तविक स्वरूप को पूरे भारत के सामने भी बंगाल ही ला रहा है।

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