डीप स्टेट बनाम भारतीय राष्ट्रवाद
भारत आज वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनाई है। लेकिन जैसे-जैसे भारत आत्मनिर्भरता, सशक्त राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसी अनुपात में तथाकथित "डीप स्टेट" (Deep State) की गतिविधियाँ भी तेज़ हो रही हैं। डीप स्टेट को सामान्यत: वैश्विक ताक़तों, गुप्त नेटवर्क, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, मीडिया गठजोड़, थिंक टैंकों और कुछ राजनीतिक–ब्यूरोक्रेटिक हितसमूहों के संयुक्त तंत्र के रूप में समझा जाता है। इनका उद्देश्य किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्र नीतियों को नियंत्रित करना, उसे अस्थिर करना और अपनी रणनीतिक व आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखना होता है।
डीप स्टेट की रणनीति यह रही है कि वह दक्षिण एशिया के देशों को राजनीतिक अस्थिरता में उलझाकर अपनी पकड़ बनाए रखे।श्रीलंका को आर्थिक संकट में धकेलकर पश्चिमी आर्थिक संस्थाओं और रणनीतिक गठबंधनों ने चीन व भारत के प्रभाव को चुनौती दी।पाकिस्तान को राजनीतिक अस्थिरता, सेना–राजनीति टकराव और आईएमएफ की शर्तों पर झुकाकर पूरी तरह बाहरी ताक़तों पर निर्भर बना दिया गया।बांग्लादेश में चुनावी असंतोष और शासन के खिलाफ विपक्षी ताक़तों को हवा देकर डीप स्टेट ने हालात बिगाड़े।
इसी पृष्ठभूमि में भारत को भी उसी प्रकार अस्थिर करने की साज़िश चल रही है मोदी सरकार की पहचान हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भर भारत और स्वतंत्र विदेश नीति से है। यह डीप स्टेट के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि पश्चिमी शक्तियाँ चाहती हैं कि भारत उनकी शर्तों पर चले।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया बार-बार मोदी को “तानाशाह” और भारत को “लोकतंत्र के खतरे में” बताने की मुहिम चलाता है।
विभिन्न ह्यूमन राइट्स संगठन (जैसे एमनेस्टी, ह्यूमन राइट्स वॉच) भारतीय सरकार पर अल्पसंख्यकों के दमन का आरोप लगाते हैं।अकादमिक जगत और विदेशी थिंक टैंक लगातार भारत की नीतियों को “हिंदू राष्ट्रवाद” कहकर बदनाम करते हैं।यह सब जनता के मन में सरकार की नकारात्मक छवि गढ़ने का प्रयास है।CAA–NRC विरोध, JNU विवाद, शाहीन बाग आंदोलन जैसे आंदोलनों में विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के प्रमाण सामने आए।विश्वविद्यालयों को वैचारिक प्रयोगशाला बनाकर भारत के भीतर “विचारधारा युद्ध” छेड़ा गया।किसान आंदोलन में भी कनाडा और अन्य पश्चिमी देशों के खालिस्तानी नेटवर्क की संलिप्तता की चर्चा हुई।डीप स्टेट समझता है कि भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक एकता है। इसलिए इसे तोड़ना उसकी रणनीति का हिस्सा है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्राह्मणवाद, जातिवाद और दलित–अल्पसंख्यक मुद्दों को बार-बार उछाला जाता है।हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो द्वारा ब्राह्मण समाज पर अपमानजनक टिप्पणी भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक रिपोर्ट जारी करती हैं ताकि विदेशी निवेश प्रभावित हो.बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और कॉरपोरेट लॉबी भारत की आत्मनिर्भरता और “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम से परेशान हैं।
तेल, रक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में भारत की स्वतंत्र नीति (रूस से सस्ता तेल खरीदना, फ्रांस से रक्षा समझौते, चिप निर्माण) पश्चिमी देशों के हितों के खिलाफ है।
आज की राजनीति में सूचना युद्ध सबसे अहम है।ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्मों पर भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया जाता है।अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस भारत की किसी भी आंतरिक घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।विदेशी NGOs और फाउंडेशनों को फंड देकर भारत में मीडिया रिपोर्टिंग प्रभावित की जाती है।
भारत की गुटनिरपेक्ष और संतुलित विदेश नीति डीप स्टेट के हितों के खिलाफ है।रूस–यूक्रेन युद्ध में भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से संबंध बनाए रखे।चीन के खिलाफ अमेरिका की नीति से सहमति जताते हुए भी भारत ने पूरी तरह झुकने से इंकार किया।खाड़ी देशों और अफ्रीका में भारत की सक्रियता ने पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ाई।डीप स्टेट चाहता है कि भारत पूरी तरह पश्चिमी नीतियों का हिस्सा बने, लेकिन मोदी सरकार ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को प्राथमिकता दे रही है डीप स्टेट बार-बार यह नैरेटिव बनाता है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया खतरे में है।अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों (Democracy Index, Press Freedom Index) में भारत की रैंकिंग जानबूझकर घटाई जाती है।भारत के चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और संसद की कार्यवाही पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं।उद्देश्य यह है कि विश्व समुदाय भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों से भटका हुआ दिखे।
डीप स्टेट का हमला केवल मोदी पर नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय राष्ट्रवाद पर है। मोदी सरकार इसलिए निशाने पर है क्योंकि उसने भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर और वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।छात्रों के आंदोलनों, जातीय–धार्मिक विभाजन, मीडिया नैरेटिव, आर्थिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नकारात्मक प्रचार—all मिलकर यह दिखाते हैं कि डीप स्टेट भारत को उसी तरह अस्थिर करना चाहता है जैसे उसने पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश को किया।ट्रंप के सलाहकार की ब्राह्मण विरोधी टिप्पणी इसका ताज़ा उदाहरण है, जो भारतीय समाज की एकता को तोड़ने की वैश्विक साजिश का हिस्सा है।भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इन हमलों को पहचानकर अपनी आंतरिक एकजुटता, सांस्कृतिक शक्ति और आत्मनिर्भरता को और सशक्त करे। डीप स्टेट की चालें तभी असफल होंगी जब जनता और नेतृत्व मिलकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे।
Dr Rajneesh Mishra
ICPR, New Delhi
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