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विश्वविद्यालयों मे समानता या असमानता का कानून!

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विश्वविद्यालय केवल कक्षाओं, परीक्षाओं और डिग्रियों का स्थान नहीं होता, बल्कि वह समाज की बौद्धिक आत्मा, लोकतांत्रिक विवेक और आलोचनात्मक चेतना का केंद्र होता है। इसी कारण विश्वविद्यालय राजनीतिक और सामाजिक रूप से अत्यंत संवेदनशील संस्थान होते हैं। यहाँ लिया गया हर निर्णय केवल शैक्षणिक ढाँचे को ही नहीं, बल्कि समाज की दिशा, पीढ़ियों की सोच और लोकतंत्र की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। ऐसे में विश्वविद्यालयों से जुड़े किसी भी नियामक निर्णय में संतुलन, समावेशिता, पारदर्शिता और निष्पक्षता अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। इसी संदर्भ में यूजीसी द्वारा विश्वविद्यालयों के लिए प्रस्तावित इक्विटी कमेटी को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि यह कमेटी किसी विशेष आग्रह, पूर्वाग्रह या सीमित सामाजिक दृष्टिकोण के आधार पर गठित की जाती है, तो यह स्वयं अपने घोषित उद्देश्य—“समानता” और “न्याय”—को ही कमजोर कर देती है। विश्वविद्यालयों में इक्विटी का प्रश्न अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय है, जिसे किसी एक सामाजिक श्रेणी या पहचान के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।यूजीसी की प्रस्तावित इक्विटी कमेटी का सबसे बड़ा नकारात...