खुदा और गॉड के बीच गायब भारतीय ईश्वर..
सौरभ द्विवेदी द्वारा The Lallantop पर आयोजित जावेद अख्तर और मौलाना के बीच “क्या ईश्वर का अस्तित्व है” विषयक कार्यक्रम को यदि भारतीय परंपरा के आलोक में देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कार्यक्रम संवाद कम और मत-प्रस्तुति अधिक था। भारतीय परंपरा में संवाद का अर्थ केवल दो व्यक्तियों का आमने-सामने बोलना नहीं है, बल्कि सत्य की खोज के लिए साझा बौद्धिक धरातल, तर्क की स्वीकृत पद्धति और प्रतिपक्ष की बात को गंभीरता से ग्रहण करने की नैतिक तैयारी आवश्यक मानी जाती है। इस दृष्टि से यह कार्यक्रम भारतीय संवाद-परंपरा से बाहर खड़ा दिखाई देता है।इस कार्यक्रम में एक ओर Javed Akhtar थे, जिनका ईश्वर-विषयक दृष्टिकोण आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और मूलतः पश्चिमी तर्कवाद से प्रभावित है, और दूसरी ओर मौलाना थे, जिनका चिंतन इस्लामी धार्मिक आस्था की सीमाओं के भीतर संचालित था। दोनों के बीच न तो दार्शनिक शब्दावली साझा थी और न ही ज्ञानमीमांसा की समान पृष्ठभूमि। परिणामस्वरूप यह बहस भारतीय अर्थों में न तो शास्त्रार्थ थी, न वाद, न संवाद।एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी चर्चा में “खुदा” और “गॉड” की अवधा...