अरावली पहाड़ का पक्ष 🌍
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन भू-आकृतिक संरचनाओं में से एक है, जो केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं बल्कि उत्तर भारत की पारिस्थितिकी, जल-सुरक्षा, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन की रीढ़ है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली अरावली शृंखला ऐतिहासिक रूप से मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल को पुनर्भरण देने और जैविक जीवन को संरक्षण प्रदान करने का कार्य करती रही है। ऐसे में हाल के वर्षों में सरकार द्वारा अरावली के संदर्भ में उठाए गए कदम केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक प्रश्न भी खड़े करते हैं।
सरकारी नीतियों का मूल दावा यह रहा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधना आवश्यक है। इसी तर्क के आधार पर खनन गतिविधियों, रियल एस्टेट परियोजनाओं, सड़क-निर्माण और औद्योगिक विस्तार को वैधता प्रदान की गई। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह संतुलन वास्तव में साधा गया है, या विकास की भाषा में पर्यावरणीय विनाश को वैचारिक वैधता दी जा रही है। अरावली के संदर्भ में सरकार के अनेक कदम पर्यावरणीय चेतना की बजाय अर्थनीतिक प्राथमिकताओं से संचालित दिखाई देते हैं।
खनन नीति इस संदर्भ में सबसे विवादास्पद रही है। अरावली क्षेत्र में पत्थर, क्वार्ट्ज़ाइट और अन्य खनिजों का अवैध और अर्ध-वैध खनन दशकों से जारी है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा समय-समय पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद, राज्य सरकारों ने नियमों में ढील देकर या परिभाषाओं में बदलाव कर खनन को पुनः सक्रिय करने का प्रयास किया। यह स्थिति दर्शाती है कि कानून का पालन पर्यावरणीय सरोकार से नहीं, बल्कि राजनीतिक-सांस्थानिक दबावों से तय हो रहा है। सरकार यदि वास्तव में संरक्षण चाहती, तो खनन के विकल्प, स्थानीय आजीविका के वैकल्पिक साधन और पुनर्वनीकरण पर गंभीरता से निवेश करती।दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में अरावली को लेकर सरकारी रुख और भी अधिक विरोधाभासी है। एक ओर सरकार अरावली को “फेफड़े” कहकर प्रदूषण नियंत्रण का श्रेय लेना चाहती है, वहीं दूसरी ओर फार्महाउस, सड़कों, रिसॉर्ट्स और तथाकथित इको-टूरिज़्म परियोजनाओं को अनुमति देकर उसी क्षेत्र को धीरे-धीरे कंक्रीट में बदल दिया जा रहा है। नीति-निर्माण में यह द्वंद्व दर्शाता है कि पर्यावरण को प्रतीकात्मक रूप में स्वीकार किया गया है, वास्तविक नैतिक दायित्व के रूप में नहीं।
सरकार द्वारा अरावली की कानूनी परिभाषा बदलने के प्रयास भी गंभीर आलोचना के पात्र हैं। कुछ राज्यों ने अरावली को “वन” की श्रेणी से बाहर करने या इसकी भौगोलिक सीमा को संकुचित करने के प्रयास किए, जिससे बड़ी भूमि को निर्माण और खनन के लिए खोल दिया जाए। यह कदम न केवल वैज्ञानिक तथ्यों की अवहेलना करता है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(g) की मूल भावना के भी विपरीत है। पर्यावरण संरक्षण को यदि केवल प्रशासनिक सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जाएगा, तो उसका दीर्घकालिक परिणाम पारिस्थितिक असंतुलन ही होगा।
सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि स्थानीय विकास, रोजगार और शहरी विस्तार की आवश्यकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह तर्क आंशिक रूप से सही है, किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब विकास की अवधारणा संकीर्ण और अल्पकालिक हो जाती है। अरावली के विनाश से उत्पन्न जल संकट, बढ़ता तापमान, धूल भरी आँधियाँ और जैव-विविधता का ह्रास भविष्य में कहीं अधिक गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट उत्पन्न करेगा। इस दृष्टि से देखा जाए तो सरकार के कदम दूरदर्शिता के बजाय तात्कालिक लाभ पर आधारित प्रतीत होते हैं।एक और महत्वपूर्ण पहलू है स्थानीय समुदायों की भूमिका। अरावली क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीण, पशुपालक और आदिवासी समुदाय सदियों से इस पारिस्थितिकी के संरक्षक रहे हैं। सरकारी नीतियों में इन समुदायों की सहभागिता अत्यंत सीमित रही है। संरक्षण के नाम पर कभी उन्हें हटाया जाता है, तो कभी विकास के नाम पर उनके संसाधन छीन लिए जाते हैं। यह स्थिति पर्यावरणीय न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है। यदि सरकार वास्तव में अरावली को बचाना चाहती है, तो उसे स्थानीय ज्ञान, परंपरागत संरक्षण पद्धतियों और सामुदायिक स्वामित्व को नीति का केंद्रीय तत्व बनाना होगा।
सरकारी कदमों की आलोचना का अर्थ यह नहीं है कि राज्य की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि राज्य अपनी भूमिका को नियंत्रक से संरक्षक में रूपांतरित करे। विकास की अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया जाए, जिसमें प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि सह-अस्तित्व का आधार माना जाए। वर्तमान नीतियाँ इस वैचारिक परिवर्तन के अभाव को उजागर करती हैं।
अरावली के संदर्भ में सरकार का दृष्टिकोण हमें एक बड़े दार्शनिक प्रश्न की ओर ले जाता है क्या आधुनिक राज्य प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में देखता है, या उसे एक नैतिक इकाई के रूप में भी स्वीकार करता है? जब तक दूसरा दृष्टिकोण नीति का आधार नहीं बनेगा, तब तक अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमालाएँ विकास की बलि चढ़ती रहेंगी। अतः सरकार के कदमों की समालोचना केवल प्रशासनिक या कानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक स्तर पर भी आवश्यक है। अरावली को बचाना वास्तव में भारत की उस सभ्यतागत चेतना को बचाना है, जिसमें प्रकृति और मानव के बीच शोषण नहीं, संतुलन का संबंध माना गया है.
डॉ रजनीश मिश्र
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली
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