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जाति-व्यवस्था का दार्शनिक परिप्रेक्ष्य : संस्कार-सातत्य, कुल-परंपरा और सामाजिक विन्यास

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भारतीय सामाजिक चिन्तन की संरचना को यदि उसके मौलिक तत्त्वों के आलोक में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँ की सामाजिक संस्थाएँ आकस्मिक या यांत्रिक रूप से निर्मित नहीं थीं, अपितु दीर्घकालिक सांस्कृतिक अनुभव, दार्शनिक मनन तथा मानवीय जीवन के समग्र अभ्युदय की कामना से प्रेरित थीं। तथाकथित “जाति-व्यवस्था” भी इसी व्यापक सांस्कृतिक-दृष्टि की उपज थी, जिसका मूलाधार सामाजिक-संतुलन, संस्कार-संरक्षण तथा जीवन-मूल्यों की अखंड परंपरा को सुरक्षित रखना था। इसे केवल राजनैतिक या आर्थिक चश्मे से देखना भारतीय परंपरा की जटिलता का सरलीकरण है। भारतीय मनीषा में “कुल” शब्द का आशय मात्र जैविक वंश से नहीं था। कुल का तात्पर्य था—संस्कार-परंपरा, आचार-शुद्धि, मूल्य-निष्ठा, विद्या-संस्कार तथा धर्मानुकूल जीवन-पद्धति। अतः कुलीनता का अर्थ धन, सत्ता या बाह्य प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अंतःशुचिता, संयम, कर्तव्यपरायणता और सदाचार से था। इस दृष्टि से विवाह-संस्था को केवल दाम्पत्य-संबंध नहीं माना गया, बल्कि दो संस्कार-परंपराओं के समन्वय का माध्यम समझा गया। गृहस्थाश्रम को “धर्मस्य मूलम्” कहा गया, क्योंकि वही सामाजिक ...