कोरोना काल में एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग


वैश्विक महामारी कोरोना के वैश्विक पटल पे आने के बाद पूरे दुनिया मे अफरातफरी का माहौल हो गया।भारत मे भी देश भर में सम्पूर्ण लॉक डाउन लगा दिया गया तथा उसके साथ अनेक प्रयोग किये गए।जैसे घर पे दीपक जलाना और शाम में घंटी और ताली बजाना।ताकि जो हमारे कोरोना योद्धा थे उनको एक बल मिले की देश के लोग हमारे साथ है।लेकिन इस प्रयोग ने मन के अंदर बहुत जिज्ञासा उत्पन्न किया कि जब पूरा विश्व एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित था,भय का वातावरण व्याप्त था,लोग मानसिक रूप से परेशान थे।इस समय इस तरह के प्रयोग?
इस प्रश्न का उत्तर मिला जब मैं हार्वर्ड में प्रकाशित एक लेख पढ़ रहा था जिसमे प्रयोगिक औषधि (plecebo) के बारे में पढ़ा।
प्लेसिबो इफेक्ट ऐसी ही एक चिकित्सा पद्धति है जिसमें रोगी को किसी दवा से नहीं बल्कि उसके विश्वास के आधार पर ठीक किया जाता है।प्लेसीबो इफ़ेक्ट व्यक्ति की धारणाओं और अपेक्षाओं के सिद्धांत पर आधारित है। इस चिकित्सा पद्धति का प्रभाव व्यक्ति के मन और उसके शरीर के रिश्ते पर आधारित है।
जैसे जैसे मैं इसके मनोवैज्ञानिक प्रयोग को भारतीय संदर्भ में समझने लगा स्थिति और स्पष्ट होती चली गयी।चुकी भारत गाँवों का देश है और गांवों में आज भी रविवार और मंगलवार को बच्चों को नज़र उतरवाने के लिए लंबी लाइन लगती है। एक रिसर्च में यह प्रमाणित है कि सिर्फ डॉक्टर ही नहीं पंडित-पुजारी और बाबा भी प्लेसिबो इफेक्ट का इस्तेमाल करते हैं। जब आप किसी बाबा के पास अपनी परेशानी लेकर जाते हैं तो वह आपको कोई उपाय बताता है। वह आपको विश्वास दिलाता है कि उसके बताए उपाय से आपकी समस्या हल हो जाएगी और ऐसा होता भी है। जब व्यक्ति के मन में किसी चीज़ के प्रति विश्वास हो जाता है जो प्लेसिबो इफेक्ट का प्रभाव ज्यादा होता है।और यही कारण था कि कोरोना की पहली लहर जिस तरह दुनिया के अन्य देशों को प्रभावित किया उस तरह का प्रभाव भारत मे नही दिखा।आज जब दूसरी लहर ने जिस तरह अपना विकराल रूप धारण किया है इस स्थिति में भी भारत के ग्रामीण आँचल में सामूहिक परंपरागत पद्धाति से इसका प्रतिकार किया जा रहा है।भारत मे इस प्रयोग को जिस तरह से लोगो ने अपनाया उससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रयोगकर्ता ने जिस मनोवैज्ञानिक पृष्टभूमि का आकलन किया वह प्रभावी रहा।

लेकिन इस पद्धति का नकारात्मक पक्ष भी है।जिसे nocebo effect के नाम से जाना जाता है जिसमे व्यक्ति की नकारात्मकता के कारण उसकी तबियत बिगड़ भी  सकती है।
"विश्वास के दम पर दुनिया जीती जा सकती है", यह बात आपने अक्सर बड़े-बूढ़ों को कहते सुनी होगी। इस कथन का प्रयोग ना सिर्फ इंसान की आम जिंदगी बल्कि चिकित्सा पद्धति में भी किया जाता है। 

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