आत्मप्रवंचना:-एक सांस्कृतिक संकट
बाजार और परिवार मानव जीवन की दो अत्यंत महत्वपूर्ण इकाइयाँ हैं, किन्तु दोनों का आधारभूत स्वरूप एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न होता है। बाजार का आधार व्यापार है और परिवार का आधार प्यार। बाजार में संबंधों का निर्माण आवश्यकता, लाभ और विनिमय के आधार पर होता है, जबकि परिवार में संबंध आत्मीयता, त्याग, विश्वास और सांस्कृतिक मूल्यों पर टिके होते हैं। बाजार में व्यक्ति वस्तु और मूल्य के माध्यम से जुड़ता है, वहाँ हर संबंध किसी न किसी शर्त से बंधा होता है। यदि लाभ समाप्त हो जाए तो संबंध भी समाप्त हो जाते हैं। इसलिए बाजार में सबसे महत्वपूर्ण तत्व “विश्वसनीयता” होता है, क्योंकि व्यापार बिना विश्वास के चल ही नहीं सकता। व्यापारी और ग्राहक दोनों एक-दूसरे की विश्वसनीयता को परखते हैं। वहाँ व्यवहार का केंद्र संविदा, अनुबंध और लाभ होता है। लेकिन परिवार का स्वरूप इससे बिल्कुल अलग होता है। परिवार केवल जैविक या आर्थिक इकाई नहीं है, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संस्था है, जो विश्वास और आत्मीयता की अदृश्य डोर से जुड़ी होती है। परिवार में माँ अपने पुत्र से यह शर्त नहीं रखती कि वह भविष्य में उसका लाभ लौटाएगा, पिता अपने बच्चों का पालन किसी अनुबंध के आधार पर नहीं करता, भाई-बहन का संबंध किसी व्यापारिक समझौते से संचालित नहीं होता। वहाँ संबंधों का मूल आधार निस्वार्थ विश्वास और सांस्कृतिक मूल्य होते हैं। यही कारण है कि परिवार समाज की सबसे स्थायी और संवेदनशील इकाई माना गया है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बाजार की मानसिकता धीरे-धीरे परिवारों में प्रवेश करती जा रही है। लोग संबंधों को भी लाभ और उपयोगिता के आधार पर देखने लगे हैं। जहाँ त्याग होना चाहिए वहाँ हिसाब आने लगा है, जहाँ आत्मीयता होनी चाहिए वहाँ औपचारिकता बढ़ रही है। परिणामस्वरूप परिवारों में भी विश्वास का संकट उत्पन्न होने लगा है। भारतीय संस्कृति ने सदैव परिवार को केवल रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कार निर्माण की पाठशाला माना है। क्योंकि परिवार ही वह स्थान है जहाँ व्यक्ति बिना किसी शर्त के स्वीकार किया जाता है। यदि समाज में परिवार का यह सांस्कृतिक स्वरूप कमजोर पड़ गया, तो मनुष्य आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी भीतर से अकेला और असुरक्षित हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि हम बाजार और परिवार के अंतर को समझें। बाजार जीवन की आवश्यकता है, किन्तु परिवार जीवन का आधार है। व्यापार जीवन को सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन प्रेम, विश्वास और आत्मीयता केवल परिवार ही दे सकता है। जिस समाज में परिवार का विश्वास बचा रहता है, वही समाज लंबे समय तक सांस्कृतिक रूप से जीवित और स्थिर बना रहता है।
वर्तमान सामाजिक परिवेश में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक अभाव नहीं, अपितु विश्वास का अभाव बनती जा रही है। आज व्यक्ति के पास साधन हैं, संसाधन हैं, तकनीकी प्रगति है, संचार के असंख्य माध्यम हैं, किन्तु यदि कुछ निरंतर क्षीण होता जा रहा है तो वह है – पारस्परिक विश्वसनीयता। कभी भारतीय समाज का आधार केवल विधि-विधान अथवा शासन व्यवस्था नहीं था, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक विश्वास था, जिसके कारण लोग बिना लिखित अनुबंध के भी एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहते थे। परिवारों के द्वार खुले रहते थे, संबंधों में कृत्रिमता नहीं थी, मित्रता में स्वार्थ नहीं था और समाज में व्यक्ति का मूल्य उसके धन से नहीं, उसके चरित्र से निर्धारित होता था। किन्तु आज स्थिति अत्यंत विषम होती जा रही है। व्यक्ति के वचन पर विश्वास करना कठिन हो गया है, संबंध उपयोगिता के आधार पर निर्मित होने लगे हैं, मित्रता अवसरवादी हो गई है और सामाजिक व्यवहार में आत्मीयता का स्थान औपचारिकता ने ले लिया है। इसका मूल कारण केवल आधुनिकता नहीं है, बल्कि वह मूल्य-संकट है सबसे महत्वपूर्ण बात हैआज सामाजिक जीवन में विश्वसनीयता का स्थान धीरे-धीरे “आत्म-प्रवंचना” ने ले लिया है, जिसे आधुनिक भाषा में “Bad Faith” कहा जाता है। आत्म-प्रवंचना का अर्थ है — व्यक्ति का स्वयं को भी असत्य में रखकर एक कृत्रिम जीवन जीना। जब मनुष्य भीतर कुछ और होता है और बाहर स्वयं को कुछ और प्रस्तुत करता है, तब वह केवल दूसरों को ही नहीं, स्वयं को भी धोखा दे रहा होता है। यही कारण है कि आज संबंधों में वास्तविकता कम और प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है। जहाँ सत्य और पारदर्शिता समाप्त होती है, वहाँ विश्वास भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। समाज का सबसे बड़ा संकट यही है।जिसने मनुष्य के भीतर से नैतिकता, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता को धीरे-धीरे क्षीण कर दिया है। जब समाज में सत्य का स्थान प्रदर्शन ले लेता है, जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप के स्थान पर कृत्रिम व्यक्तित्व प्रस्तुत करने लगता है, तब विश्वास का संकट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आज सोशल मीडिया के युग में मनुष्य अपनी वास्तविकता से अधिक अपनी छवि को बचाने में लगा हुआ है। लोग अपने जीवन को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो सब कुछ आदर्श हो, किन्तु भीतर से वे असुरक्षा, अकेलेपन और अविश्वास से ग्रस्त हैं। यही कारण है कि संबंधों में स्थायित्व नहीं रह गया। विवाहिक संबंध हों, मित्रता हो अथवा सामाजिक सहयोग – प्रत्येक क्षेत्र में संदेह और असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है। भारतीय संस्कृति में “श्रद्धा” को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि श्रद्धा ही विश्वास का आधार है। जहाँ श्रद्धा समाप्त होती है, वहाँ केवल व्यवहार शेष रह जाता है, आत्मीयता नहीं। आज मनुष्य दूसरे व्यक्ति को साध्य नहीं, साधन के रूप में देखने लगा है। यही उपभोक्तावादी दृष्टिकोण सामाजिक विघटन का कारण बन रहा है। पहले व्यक्ति समाज के लिए जीता था, आज समाज व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं का साधन बन गया है। परिणामस्वरूप हर व्यक्ति दूसरे के उद्देश्य और नीयत पर संदेह करने लगा है। राजनीतिक क्षेत्र में भी यही स्थिति दिखाई देती है जहाँ विचारधारा के स्थान पर अवसरवाद और लोकसेवा के स्थान पर व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जब समाज के नेतृत्वकारी वर्ग में विश्वसनीयता का संकट आता है, तब उसका प्रभाव सामान्य जनजीवन पर भी पड़ता है। शिक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। शिक्षा का उद्देश्य पहले चरित्र निर्माण माना जाता था, किन्तु आज वह केवल रोजगार प्राप्ति का माध्यम बनती जा रही है। जब शिक्षा से नैतिकता हट जाती है, तब ज्ञान केवल बुद्धि को विकसित करता है, व्यक्तित्व को नहीं। परिणामस्वरूप समाज में ऐसे लोग बढ़ते जाते हैं जो कुशल तो हैं, किन्तु विश्वसनीय नहीं। यही कारण है कि आज व्यक्ति आर्थिक रूप से समृद्ध होते हुए भी मानसिक रूप से असुरक्षित अनुभव कर रहा है। उसे यह भय बना रहता है कि कौन कब विश्वास तोड़ दे, कौन कब स्वार्थ के लिए संबंध समाप्त कर दे। इस स्थिति ने मनुष्य को भीतर से अकेला कर दिया है। भारतीय दर्शन सदैव यह कहता रहा है कि समाज केवल कानून से नहीं चलता, बल्कि नैतिक चेतना से चलता है। यदि व्यक्ति के भीतर धर्मबोध, कर्तव्यबोध और लोकमंगल की भावना जीवित रहे, तो सामाजिक संतुलन स्वतः बना रहता है। किन्तु जब व्यक्ति केवल अपने हित को सर्वोपरि मानने लगे, तब समाज में विघटन अवश्य होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पुनः उन सांस्कृतिक मूल्यों की ओर लौटें जिन्होंने भारतीय समाज को हजारों वर्षों तक एकसूत्र में बाँधकर रखा। सत्य, करुणा, निष्ठा, वचनबद्धता और आत्मीयता केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि सामाजिक स्थिरता के आधार हैं। यदि परिवारों में बच्चों को केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और विश्वसनीयता का संस्कार दिया जाए, यदि शिक्षा में पुनः चरित्र और नैतिकता को महत्त्व दिया जाए, यदि समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके बाह्य प्रदर्शन से नहीं बल्कि उसके आचरण से निर्धारित हो, तब धीरे-धीरे यह विश्वास पुनः स्थापित हो सकता है। क्योंकि अंततः कोई भी समाज केवल तकनीकी उन्नति से महान नहीं बनता, बल्कि पारस्परिक विश्वास, नैतिक चेतना और सांस्कृतिक आत्मीयता से महान बनता है। जिस दिन मनुष्य पुनः यह अनुभव करने लगेगा कि संबंध लाभ से बड़े हैं, सत्य प्रदर्शन से श्रेष्ठ है और विश्वास किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूँजी है, उसी दिन से सामाजिक पुनर्निर्माण का वास्तविक आरंभ होगा।
डॉ रजनीश मिश्र
पोस्ट-डॉक फेलो
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
Very good 👍👍👍👍👍
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