भारतीय जाति व्यवस्था में उत्पादकता

भार


जातिवाद और भेद भाव जो भारत के अतीत का कटु सत्य है और इसको स्वीकार करने में किसी को कोई परहेज नही होना चाहिए।लेकिन इसके साथ यह भी स्वीकार करना चाहिए कि भारत मे सहअस्तित्व की भावना अन्य महाद्वीप के देशों से ज्यादा है।यही कारण है कि इतनी तथाकथित भेदभाव वाली व्यवस्था भी इतने लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाये रखने में सफल हुई।लेकिन वर्तमान में जातिगत भेदभाव अपराध है और इसका पूर्ण विरोध होना चाहिए।इसकी पूर्ण समाप्ति केलिए आपसी सामाजिक स्वीकार्यता और उच्च नीच की भावना का त्याग होना चाहिए । कुछ अपवाद की घटनाओं को छोड़ दे तो हमारा समाज इस दिशा में काफी तेजी से बढ़ रहा है।यह सर्वविदित है । लेकिन किसी भी घृणित अतीत से बेहतर भविष्य के ओर बढ़ने का एक माध्यम यह हो सकता है कि हम उसपर विमर्श त्याग दे।लेकिन आजकल साहित्य और अभिनय के माध्यम से उस घृणित परिवेश के चित्रण हमारे मंसूबो पे प्रश्न खड़ा कर रहा है।कि हम भविष्य का निर्माण किस आधार पे करना चाह रहे है?समाज के एक खास वर्ग के लोग इस अतित के परिवेश को लेकर एक पूर्वाग्रह बना लिए है और यह मानव स्वभाव है कि हम किसी के लिए एक धारणा बना लेते हैं , फिर उसी धारणा को केन्द्र में रखकर अपने मन में उसके चरित्र का निर्माण कर लेते हैं और बाद में उसे ही सम्पूर्ण सत्य समझने लगते हैं । हमारा मन उस धारणा को खंडित होते हुए देखना स्वीकार ही नहीं करता । ... अच्छी तरह जाने-समझे बिना , किसी के लिए , किसी भी प्रकार की धारणा बनाकर , किसी भी निर्णय पर पहुंचना - एक गम्भीर मानवीय भूल है इसी भूल के कारण हम समाज के अन्यवर्ग को अपना प्राकृतिक दुश्मन मान बैठते है।आज एक स्नातक युवा के विचार परिवर्तन का आधार एक मूवी बन रही है।उसके जीवन के पूर्ण विश्लेषण को तीन घण्टे में बदल दिया जा रहा है ।इन तमाम सामाजिक बदलाव को आज हमें एक चुनौती के रूप में लेने की जरूरत है।और एक सभ्य और विकसित समाज की तरफ बढ़ना है।

वर्तमान परिदृश्य में भारत का सबसे बड़ा दुश्मन किसे बताऊं? उस व्यापारी समाज को जो उत्पादक होने की बजाय ट्रेडर बनने में अपना फायदा देखता है? फिर वो गलत क्या करता है? उत्पादन तो उसका स्वाभाविक कर्म है भी नहीं। वह तो स्वभाव से ट्रेडर ही रहा है। भारत का माल मिलेगा तो भारत का माल बेंच देगा और नहीं मिला तो चीन से लाकर बेंच देगा। खरीदना बेचना और उस पर लाभांश कमा लेना इतना ही उसका काम है। और यही वह कर रहा है। 

तो हमारे यहां उत्पादक कहां चले गये? मार्क्स से जब किसी ने पूछा कि भारत के बारे में आपके क्या विचार हैं तो मार्क्स ने कहा कि भारत में उत्पादन व्यवस्था जातियों में निहित है। अर्थात दूर जर्मनी में बैठे मार्क्स भी यह समझ रहे थे कि भारत में उत्पादन जातियों में निहित हैं। लेकिन उन्हीं के नाम पर राजनीति करनेवाले मार्क्सवादियों ने जाति के खिलाफ बिगुल बजा दिया। तो क्या उन्होने मार्क्स को नहीं पढ़ा था? या फिर वो जाति को नहीं जानते थे? अगर दोनों को जानते थे तो फिर जातीय उत्पादन व्यवस्था पर जातिवाद के नाम पर प्रहार क्यों किया? आखिर क्यों उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की हां में हां मिलाया जिसने जानबूझकर ब्राह्मणवाद की बहस पैदा किया था? 

निश्चित रूप से भारत में ब्राह्मणवाद की व्यर्थ बहस जातियों को उनके परंपरागत उत्पादन को छीनने से उपजे रोष को भटकाने के लिए किया गया था। एक साजिश के तहत अंग्रेजों और कम्युनिस्टों ने ब्राह्मणवाद की बहस पैदा करके जातियों में छिपे उत्पादन कौशल को समाप्त कर दिया। जातियां जो उत्पादनकर्ता थीं उनका उत्पादन उनके हाथ से छीनकर उन्हें आरक्षण की लाइन में खड़ा कर दिया गया। अब वो अपने उत्पादन के लिए नहीं आरक्षण के लिए लड़ रहे हैं और दिन रात ब्राह्मणवाद को गाली दे रहे हैं। 

भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से नष्ट करने के लिए कम्युनिस्टों को और भला इससे अधिक क्या चाहिए था? 


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