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'आत्मनिर्भर भारत 'एक द्वितीय प्रयोग

जब से देश में कोरोना ने प्रवेश किया है तब से विकास की गहरी खाई दिन प्रतिदिन दिखाई दे रही है ।जो बिना सूक्ष्मदर्शी दूरदर्शी के दिख रही है ।यह उनको भी दिखाई दे रही है जो देख नहीं पाते , या जानबूझकर देखना नहीं चाहते है ।कुछ भक्त कंपनी के उस चश्में को हटाना ही  नहीं चाहते जिससे कंपनी का चिल्लाता हुआ स्मार्ट डेवलपमेंट सड़क पर दिखे ।
कोरोना ने दुनियां  को दिखा दिया कि विकास प्राकृतिक स्थायित्त्व समानता लिए हुए होना चाहिए ।अन्यथा छिटक विकास सिर्फ खाइयां पैदा करता है ।जो विपरीत परिस्थितियों महामारियों में  सड़क पर टहलता है ।जो सबके लिए नुकसानदायक है ।
कोरोना संकटकाल में बेघर मजबूर मजदूर सड़क पर भूखा प्यासा बिलखता हुआ,कोसों दूर अपने घर की राह पकड़ा हुआ है ।
असल में यह राह कथित  विकास पकड़ा हुआ था जिसने इतनी मजबूरियां पैदा कर दी कि गांधीजी का ग्रामीण विकास उठकर चलकर दौड़कर भागकर शहर आ गया ।जहां इसे ना  शिक्षा,ना स्वास्थ्य ,ना शारीरिक,ना स्थायित्त्व  विकास  का ख्याल रहा ,यहां तो यह सिर्फ दो वक्त की रोटी पर सिमटा हुआ है।आज जब  इसकी रोटी पर कोरोना का कब्जा हो गया है तब इसने गांव की ओर रुख किया है ।रोजगार की रोटी बेरुखी होकर सड़क और पटरी पर पड़ी हुई है।

आज फिर जरूरत आ पड़ी गांव के घर की रोटी की ।सरकार को गांधी जी के घर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देनी होगी ।
मैं अपने लेखों में बार बार इस बात को लिखता रहा हूँ कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अधिक फोकस करें ।बात अब इस बात की है क्या यह सब कह देने या संकल्प लेने से हो जाएगा ।जबकि पहले से ही हम आर्थिक संकट से जूझ रहे थे । महामारी ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि अब किस तरह का विकास होना चाहिए
यद्यपि आजादी के बाद गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारियों गांधी के आर्थिक विचारों के विरुद्ध औद्योगीकरण का रास्ता चुना और आगे चलकर नब्बे के दशक के बाद उदारीकरण के रथ पर सवार हो गए ।यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अतीत में नीति निर्माताओं ने कभी भी स्वदेशी प्रतिभा, संसाधनों और ज्ञान पर भरोसा नहीं किया । बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र में विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जोर दिया ।
महात्मा के वैचारिकी का प्रभाव भी देश मे व्यापक पड़ा था जिसके अनेक उदाहरण है।
31 जुलाई 1921 को परेल, मुंबई में एलफिंस्टन मिल के पास पहली बार सार्वजनिक रूप से विदेशी कपड़ों की होली जलाने के बाद, गांधी ने अपने भाषण में साफ तौर पर कहा कि ,"स्वदेशी के बिना स्वराज्य असंभव है ।हम अपने आप को शुद्ध नहीं कर सकते जब तक कि हम खुद स्वदेशी की प्रतिज्ञा नहीं ले लेते ...स्वदेशी की शुरुआत का संकेत तभी मिलेगा जब हम विदेशी कपड़ों का पूर्ण और स्थाई रूप से बहिष्कार करेंगे। मैं कपड़े जलाने के समारोह को एक धार्मिक उत्सव के तौर पर देखता हूं।"
गांधी द्वारा विदेशी कपड़ों को जलाने का मतलब भारतीय वस्त्रों एवं गांव की अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ विरोध को अभिव्यक्त करना नहीं था बल्कि वे भारतीयों द्वारा बुने वस्त्रों की बजाय ब्रिटिश वस्त्रों के लिए अपनी पसंद के जरिए भारतीयों द्वारा श्रम के विनाश में स्वीकृति के पाप से मुक्ति पाने की एक प्रक्रिया थी । गांधी की स्वदेशी मानसिकता की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था।

ब्रिटिश सरकार के सांख्यिकी आंकड़े बताते हैं कि गांधी के स्वदेशी आंदोलन के कारण ब्रिटिश उपनिवेशवाद के लंबे समय के इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य को सबसे बड़ा नुकसान हुआ। ब्रिटिश इंडिया में यूनाइटेड किंगडम का कुल निर्यात 90. 6 मिलियन पाउंड से घटकर 52. 9 मिलियन पाउंड हो गया। यह बदलाव 1924 से लेकर 1930 तक यानी 6 वर्षों में हुआ। भारत में ब्रिटिश कपास के सामान का निर्यात उन्नीसवीं सदी के शुरुआत में बहुत ऊंचाइयों पर था जिसमें 1929 में 14 फ़ीसदी की गिरावट आई और बहिष्कार के वर्ष 1930 में 42.4 फ़ीसदी की गिरावट आई। अक्टूबर 1930 से अप्रैल 1931 के बीच विदेशी कपड़ों का बहिष्कार अपने चरम पर था, इस दौरान मैनचेस्टर मिलों के भारतीय निर्यात में 84 फ़ीसदी की गिरावट आई । नतीजा दिसंबर 1930 में लंकाशायर में बेरोजगारी की दर 47.4 फ़ीसदी की वृद्धि हुई । छः लाख मिल श्रमिकों में लगभग आधे श्रमिकों की नौकरी चली गई । ब्रिटिश साम्राज्य ने पहली बार अपने आपको असहाय महसूस किया ।
गांधी जी के घर में नेहरू जी की योजनाओं की प्लांनिग के साथ डॉ  बी आर आंबेडकर  की अद्वितीय श्रेष्ठ अर्थव्यवस्था अपनानी होंगी ।जो विकेंद्रीकरण के साथ साथ सामाजिक आर्थिक राजनीतिक सांस्कृतिक आधार युक्त है।जो कार्ल मार्क्स की आर्थिक नीतियों से भी श्रेष्ठ है । राज्य और केंद्र सरकार को पंचायत तहसील स्तर पर विकास करना चाहिए ।अधिक से अधिक औद्योगिक संस्थाएं  उत्कृष्ट शिक्षण संस्थायें तृतीय स्तर पर हो जिससे नागरिकों को लोकल में ही  रोजगार  शिक्षा मिल सकें ।उन्हें रोजगार व शिक्षा के लिए बोरी बिस्तर सहित दर दर ना भटकना पड़े ।जिससे भटकता विकासशील भारत आत्मनिर्भर बन सकें।

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