कम्युनिज्म और कोरोना:-छद्मयुद्ध
कम्युनिज्म और कोरोना दोनो का सम्बंध बाप बेटे का है।एक समाज के लिए घातक है तो दूसरा मानव जाति के लिए।आखिर दोनो की पृष्ठभूमि भी एक खास तरह के मानसिकता से सम्बद्ध है।
कोरोना महामारी के वैश्विक पटल पे आने के बाद यह बहस आम हो गया कि कोरोना एक जैविक हथियार है।और यह चीन के वुहान शहर के लैब से निकला है।कोरोना के अनेकों लहरों में उसके स्वरूप का बिकराल होना उपरोक्त मान्यता को प्रमाणित करती है।उसके साथ साथ दुनिया भर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों ने अनेको रिसर्च पेपर के माध्यम से यह पुष्ट कर दिया है की यह कोई आपदा नही बल्कि एक जैविक हथियार है।
अब यह समझने की जरूरत है कि एक कम्युनिस्ट देश जो एक तथाकथित यूटोपियन विचार को अपने आधार में स्थापित किया है।उसको ऐसे जैविक हथियार बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?ऐसे कितने और जैविक हथियार बनाये है?
हिंसा द्वारा पोषित विचारधारा की उपज यही हो सकता है आज पूरी दुनिया इस बात को देख रही है और समझ रही है।इनका जो सामाजिक समानता की बात है वह लोगो को सिर्फ मूर्ख बनाने के लिए है इनके मूल में तो ऐसी हिंसक प्रवृत्ति है जिसने आज मानवता को एक ऐसी स्थिति में लाके खड़ा कर दिया है जहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था बनी हुई है।
कोरोना एक छद्म युद्ध है उस वैचारिकी की जिसने दुनिया को हिंसक और अराजकता के माध्यम से तथाकथित समानता को स्थापित करने का प्रयास किया और असफल रहा।वह इस बात को समझता कि दुनिया ने इस हिंसक वैचारिकी को छोड़कर नव उदारवाद को स्वीकार किया है इस बिलबिलाहट में उसने इन जैविक हथियारों का प्रयोग विश्व को असन्तुलित करने का हिंसक प्रयास किया है।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के खुफिया विभाग ने यह दावा किया है कि वर्ष 2015 में जब पूरा विश्व कोरोना से अनजान था उस समय चीन कोरोना के दुष्प्रभावों की समीक्षा कर रहा था। ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) के कार्यकारी निदेशक पीटर जेनिंग्स ने बताया है कि ये रिपोर्ट उस दावे के मामले में एक बड़ा लिंक हो सकती है, जिसे लेकर लंबे समय से आशंका जताई जा रही है. ये साफ तौर पर जाहिर करता है कि चीनी वैज्ञानिक कोरोना वायरस ( के अलग-अलग स्ट्रेन को सैन्य हथियार के तौर इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे थे. उनका कहना है कि हो सकता है कि ये मिलिट्री वायरस गलती से बाहर आ गया, यही वजह है कि चीन किसी भी तरह की बाहरी जांच को लेकर असहयोग करता रहा है.
यह समझने की जरूरत है कि यह तृतीय विश्वयुद्ध है जो साम्यवादी हिंसक मानसिकता का अंतिम परिणति है।
कोरोना महामारी के वैश्विक पटल पे आने के बाद यह बहस आम हो गया कि कोरोना एक जैविक हथियार है।और यह चीन के वुहान शहर के लैब से निकला है।कोरोना के अनेकों लहरों में उसके स्वरूप का बिकराल होना उपरोक्त मान्यता को प्रमाणित करती है।उसके साथ साथ दुनिया भर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों ने अनेको रिसर्च पेपर के माध्यम से यह पुष्ट कर दिया है की यह कोई आपदा नही बल्कि एक जैविक हथियार है।
अब यह समझने की जरूरत है कि एक कम्युनिस्ट देश जो एक तथाकथित यूटोपियन विचार को अपने आधार में स्थापित किया है।उसको ऐसे जैविक हथियार बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?ऐसे कितने और जैविक हथियार बनाये है?
हिंसा द्वारा पोषित विचारधारा की उपज यही हो सकता है आज पूरी दुनिया इस बात को देख रही है और समझ रही है।इनका जो सामाजिक समानता की बात है वह लोगो को सिर्फ मूर्ख बनाने के लिए है इनके मूल में तो ऐसी हिंसक प्रवृत्ति है जिसने आज मानवता को एक ऐसी स्थिति में लाके खड़ा कर दिया है जहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था बनी हुई है।
कोरोना एक छद्म युद्ध है उस वैचारिकी की जिसने दुनिया को हिंसक और अराजकता के माध्यम से तथाकथित समानता को स्थापित करने का प्रयास किया और असफल रहा।वह इस बात को समझता कि दुनिया ने इस हिंसक वैचारिकी को छोड़कर नव उदारवाद को स्वीकार किया है इस बिलबिलाहट में उसने इन जैविक हथियारों का प्रयोग विश्व को असन्तुलित करने का हिंसक प्रयास किया है।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के खुफिया विभाग ने यह दावा किया है कि वर्ष 2015 में जब पूरा विश्व कोरोना से अनजान था उस समय चीन कोरोना के दुष्प्रभावों की समीक्षा कर रहा था। ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) के कार्यकारी निदेशक पीटर जेनिंग्स ने बताया है कि ये रिपोर्ट उस दावे के मामले में एक बड़ा लिंक हो सकती है, जिसे लेकर लंबे समय से आशंका जताई जा रही है. ये साफ तौर पर जाहिर करता है कि चीनी वैज्ञानिक कोरोना वायरस ( के अलग-अलग स्ट्रेन को सैन्य हथियार के तौर इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे थे. उनका कहना है कि हो सकता है कि ये मिलिट्री वायरस गलती से बाहर आ गया, यही वजह है कि चीन किसी भी तरह की बाहरी जांच को लेकर असहयोग करता रहा है.
यह समझने की जरूरत है कि यह तृतीय विश्वयुद्ध है जो साम्यवादी हिंसक मानसिकता का अंतिम परिणति है।
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