आंदोलन,हिंसा और सरकार


सरकार किसी की भी हो आंदोलनों से निपटने का तरीका एक होता है। आंदोलन के बीच फूट पैदा करो और उन्हें हिंसा के लिए उकसाओ। ये तरीका संभवत: ब्रिटिश नौकरशाही ने शुरु किया था जिसे भारत सरकार की नौकरशाही जस का तस इस्तेमाल करती है।
जो भी सरकार होती है उसे हिंसा पसंद होती है। क्योंकि हिंसा ही वह रास्ता है जिसके बहाने सरकारें आंदोलनों का दमन करती हैं। अगर किसी आंदोलन में हिंसा न हो तो हो सकता है सरकार उसमें हिंसा पैदा करने का उपाय भी कर दे।

ब्रिटेन में रहने दौरान गांधी जी ये बात समझ चुके थे इसलिए उन्होंने अहिंसा का रास्ता चुना। ये एक ऐसा हथियार था जिसके सामने ब्रिटिश सरकार बेबस हो गयी।

बीते दो दशक में मैने जितने आंदोलन देखे हैं अंतत: वो हिंसा पर आकर ही समाप्त होते हैं। आंदोलन जब तक अहिंसक होता है, सरकारें चाहकर भी कुछ नहीं कर पातीं।

इससे फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता के शिखर पर मनमोहन बैठे हैं या मोदी। नौकरशाही वही रहती है और उसके जन आंदोलन विरोधी हथकंडे भी लगभग एक जैसे ही होते हैं। याद करिए 2012 का निर्भया आंदोलन। कैसे उसे इंडिया गेट पर खत्म किया गया था। जब नौकरशाही को लगा कि अब इन नौजवानों को इंडिया गेट से नहीं हटाया जा सकता तो रात में वहां ईंटे रख दी गयीं। होम मिनिस्ट्री की गाड़ी खड़ी कर दी गयी और अगली सुबह ऐसी हिंसा भड़की कि चार छह घंटे के अंदर सबको खदेड़कर भगा दिया गया।

इस किसान आंदोलन को भी कुछ उसी अंदाज में खत्म किया गया। हिंसा और उपद्रव के लिए लोगों को उकसाया गया। एक बार हिंसा और उपद्रव शुरु हो जाए तो नौकरशाही की बांछे खिल जाती हैं। उन्हें लगता है, बस अब मौका मिल गया। इसके बाद जो कुछ होता है वह लॉ एण्ड आर्डर मेन्टेन करने के लिए जरूरी होता है।

रजनीश मिश्र
शोध छात्र ,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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