राजघाट पर फूल, जंतर-मंतर पर ख़ामोशी!


क्या गांधी आज केवल एक स्मृति बनकर रह गए हैं? क्या हर वर्ष 2 अक्टूबर को राजघाट जाकर पुष्प अर्पित कर देना, श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर देना और उनके चित्र पर माल्यार्पण कर देना ही गांधी को याद करने का अर्थ है? यदि ऐसा है तो यह गांधी के प्रति सबसे बड़ा अन्याय है। गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे सत्य, अहिंसा, संवाद, नैतिक साहस और जनशक्ति के प्रतीक थे। उन्होंने दुनिया की सबसे शक्तिशाली औपनिवेशिक सत्ता को तलवार से नहीं, बल्कि सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और अहिंसक संघर्ष के बल पर चुनौती दी। उन्होंने यह विश्वास जगाया कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की नैतिक चेतना और शासन की संवेदनशीलता में निहित होती है। इसलिए गांधी को केवल स्मारकों, डाक टिकटों और सरकारी समारोहों तक सीमित कर देना उनके विचारों का सम्मान नहीं, बल्कि उनका औपचारिककरण है। आज प्रश्न यह नहीं है कि हम गांधी को कितना याद करते हैं, बल्कि यह है कि क्या हमारी शासन व्यवस्था गांधी के बताए हुए मूल्यों पर चलने की इच्छा रखती है? यदि कोई नागरिक, वह भी देश का एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शिक्षक और नवप्रवर्तक, लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर रहकर अपनी बात रखने के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आमरण अनशन का मार्ग चुनता है और कई दिनों तक उसकी आवाज़ पर कोई सार्थक संवाद नहीं होता, तो यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद की संस्कृति पर भी प्रश्नचिह्न है। सोनम वांगचुक का आंदोलन किन मुद्दों पर आधारित है, उनके साथ कौन लोग जुड़े हैं या उनके सभी विचारों से सहमत हुआ जाए या नहीं, यह अलग विमर्श का विषय हो सकता है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है और किसी भी आंदोलन के पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं। किंतु उससे पहले यह अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या एक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व अपने नागरिक की बात सुनना नहीं है? क्या संवाद लोकतंत्र की पहली शर्त नहीं है? क्या शांतिपूर्ण अनशन, सत्याग्रह और नैतिक आग्रह की परंपरा इसी देश की देन नहीं है? यदि गांधी के देश में अहिंसक आंदोलन भी शासन को संवाद के लिए प्रेरित नहीं कर पाते, तो हमें आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं। एक जागरूक नागरिक होने के नाते शिक्षा व्यवस्था की कमियों, परीक्षाओं में बार-बार होने वाले पेपर लीक, युवाओं के भविष्य, पर्यावरण, सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं और शासन की जवाबदेही जैसे प्रश्न उठाना किसी भी व्यक्ति का लोकतांत्रिक अधिकार है। इन प्रश्नों का उत्तर दमन या उपेक्षा नहीं, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और समाधान होना चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनाव जीत लेने का नाम नहीं है; लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की आवाज़ सुनना, असहमति का सम्मान करना और नैतिक प्रश्नों का उत्तर नैतिकता से देना। गांधी ने हमें यही सिखाया था कि विरोधी को शत्रु नहीं, संवाद का सहभागी समझो। यदि आज हमारी राजनीति में संवाद की जगह मौन, संवेदनशीलता की जगह कठोरता और नैतिक आग्रह की जगह शक्ति प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है, तो यह चिंता का विषय है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी शक्ति उसका बहुमत नहीं, बल्कि जनता का विश्वास और उसकी संवेदनशीलता होती है। इतिहास गवाह है कि जिन व्यवस्थाओं ने जनता की शांतिपूर्ण आवाज़ को अनसुना किया, उन्हें अंततः जनता के ही प्रश्नों का सामना करना पड़ा। इसलिए यह समय किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का है जिनकी नींव गांधी ने रखी थी। यदि हम सचमुच गांधी को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने से अधिक आवश्यक है कि हम सत्य, अहिंसा, संवाद, संवेदनशीलता और नैतिक उत्तरदायित्व को अपने सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ। अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि जिस देश ने दुनिया को सत्याग्रह का मार्ग दिखाया, उसी देश में सत्याग्रह की आवाज़ क्यों अनसुनी कर दी गई।

डॉ रजनीश मिश्र 

भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली 

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