व्यक्ति और संस्कृति का द्वंद्व


मनुष्य का व्यक्तित्व किसी एक क्षण में निर्मित होने वाली घटना नहीं, अपितु दीर्घकालिक अनुभव, परिस्थितियों, संस्कारों, विकल्पों तथा आत्मचेतना की निरंतर साधना का परिणाम होता है। इसी प्रकार संस्कृति भी किसी एक व्यक्ति अथवा एक पीढ़ी की रचना नहीं होती, बल्कि असंख्य व्यक्तियों के जीवनानुभव, मूल्यबोध, संघर्ष, साधना, संवेदना और सृजनशीलता के समन्वित प्रवाह से निर्मित होती है। यदि व्यक्ति संस्कृति का वाहक है तो संस्कृति व्यक्ति की अंतःचेतना का परिष्कृत रूप है। इस पारस्परिक संबंध को समझने के लिए तीन अत्यंत सार्थक अवधारणाएँ हमारे समक्ष उपस्थित होती हैं—अभाव, प्रभाव और स्वभाव। ये तीनों केवल मनोवैज्ञानिक अथवा सामाजिक अवस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के मूल्यबोध, जीवन-दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना और चरित्र-निर्माण के मूलाधार हैं। किसी व्यक्ति की संपूर्ण जीवन-यात्रा को यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो ज्ञात होता है कि वह या तो अभाव से संचालित होता है, या प्रभाव से, अथवा स्वभाव से। इन तीनों अवस्थाओं से उत्पन्न संस्कृति, जीवन-मूल्य, निर्णय-प्रक्रिया, सामाजिक व्यवहार और आत्मबोध में अत्यंत गहरा अंतर विद्यमान रहता है। वस्तुतः संस्कृति का सम्यक् अध्ययन तभी संभव है जब इन तीनों आयामों को केवल सामाजिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाए।

अभाव वह स्थिति है जहाँ जीवन की आवश्यकताओं, अवसरों, संसाधनों अथवा स्नेह के न्यूनत्व के बीच व्यक्ति का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है। अभाव केवल आर्थिक नहीं होता; भावनात्मक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अभाव भी उतने ही प्रभावशाली होते हैं। अभाव मनुष्य को संघर्ष का संस्कार देता है। वह उसे धैर्य, सहिष्णुता, श्रम, संयम और संवेदनशीलता की ओर उन्मुख कर सकता है। किन्तु वही अभाव यदि विवेक और मूल्यबोध से संयुक्त न हो तो वह कुंठा, प्रतिशोध, हीनता, असुरक्षा और संग्रह-वृत्ति का भी कारण बन सकता है। अतः अभाव स्वयं न तो शुभ है और न अशुभ; उसकी दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति उस अभाव को किस प्रकार आत्मसात् करता है। अनेक महापुरुषों का जीवन अभावों में प्रारंभ हुआ, किन्तु उन्होंने अभाव को अपनी सीमा नहीं, साधना बना लिया। इस प्रकार अभाव से निर्मित संस्कृति में श्रम का गौरव, संवेदना का विस्तार, संघर्ष की गरिमा और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित होता है। किन्तु जब अभाव जीवन-दृष्टि का स्थायी केंद्र बन जाता है, तब व्यक्ति समृद्धि प्राप्त करने के बाद भी मानसिक रूप से अभावग्रस्त ही बना रहता है। ऐसी स्थिति में संस्कृति का निर्माण नहीं, अपितु केवल आवश्यकता की पूर्ति जीवन का लक्ष्य बन जाती है।

प्रभाव का क्षेत्र अभाव से भिन्न है। यहाँ व्यक्ति का निर्माण उसके द्वारा ग्रहण किए गए आदर्शों, व्यक्तियों, संस्थाओं, परंपराओं, विचारधाराओं और सामाजिक वातावरण से होता है। मनुष्य स्वभावतः अनुकरणशील प्राणी है। बाल्यावस्था से ही वह परिवार, समाज, गुरु, मित्र, साहित्य, धर्म, राजनीति, तकनीक और संचार माध्यमों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। प्रभाव के माध्यम से संस्कृति का संवहन पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता है। परंपराएँ इसी प्रभाव की निरंतरता हैं। किन्तु प्रभाव का एक दूसरा पक्ष भी है। यदि व्यक्ति विवेकहीन होकर केवल बाह्य आकर्षणों, लोकप्रियता, सत्ता, उपभोगवाद अथवा क्षणिक प्रवृत्तियों से प्रभावित होता है, तो उसका व्यक्तित्व उधार की चेतना पर आधारित हो जाता है। तब वह स्वयं विचार नहीं करता, बल्कि विचारों का उपभोक्ता बन जाता है। ऐसी स्थिति में संस्कृति का सृजन नहीं होता, केवल सांस्कृतिक अनुकरण होता है। प्रभाव से निर्मित व्यक्ति का मूल्यबोध प्रायः परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है, क्योंकि उसका केंद्र स्वयं के भीतर नहीं, बाहर स्थित होता है। इसलिए प्रभाव संस्कृति का आवश्यक साधन तो है, किन्तु यदि वह आत्मविवेक से संयमित न हो तो वही संस्कृति को उसकी मौलिकता से दूर ले जा सकता है। भारतीय परंपरा ने इसलिए केवल गुरु का नहीं, अपितु 'सद्गुरु' का महत्व प्रतिपादित किया; केवल ज्ञान का नहीं, अपितु 'विवेकयुक्त ज्ञान' का आग्रह किया, क्योंकि प्रभाव तभी कल्याणकारी है जब वह व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए, आत्मविस्मृत नहीं।

स्वभाव इन दोनों से भिन्न और अधिक गहन अवधारणा है। स्वभाव वह है जो व्यक्ति के अस्तित्व का सहज, मौलिक और आत्मप्रकाशित स्वरूप है। यह किसी बाह्य दबाव, अभाव अथवा प्रभाव का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मचेतना की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। भारतीय दर्शन में स्वभाव का संबंध प्रकृति, संस्कार, चित्त और आत्मबोध से जोड़ा गया है। जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, तब उसके भीतर से जो मूल्य, करुणा, सत्यनिष्ठा, न्यायबुद्धि, सौंदर्यबोध और सृजनशीलता प्रस्फुटित होती है, वही स्वभावजन्य संस्कृति है। यह संस्कृति किसी प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न नहीं होती, किसी अनुकरण से संचालित नहीं होती और किसी अभाव की प्रतिक्रिया भी नहीं होती। यह आत्मानुभूति का विस्तार होती है। ऐसे व्यक्ति का आचरण परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है, किन्तु उसके मूल मूल्य परिवर्तित नहीं होते। वह बाह्य सफलता या असफलता से अधिक अपने अंतःकरण की शुचिता को महत्व देता है। इसलिए स्वभाव से निर्मित संस्कृति सर्वाधिक स्थायी, सृजनात्मक और मानवीय होती है।

यदि इन तीनों की तुलनात्मक समीक्षा की जाए तो स्पष्ट होता है कि अभाव व्यक्ति को संघर्ष सिखाता है, प्रभाव उसे दिशा देता है और स्वभाव उसे पहचान प्रदान करता है। अभाव से उत्पन्न संस्कृति में परिश्रम की गरिमा होती है, प्रभाव से उत्पन्न संस्कृति में परंपरा और सामूहिकता का बल होता है, जबकि स्वभाव से उत्पन्न संस्कृति में मौलिकता, स्वतंत्रता और आत्मप्रकाश का तेज होता है। किन्तु जीवन की वास्तविकता यह है कि कोई भी व्यक्ति पूर्णतः केवल अभाव, केवल प्रभाव अथवा केवल स्वभाव का प्रतिनिधि नहीं होता। उसके भीतर ये तीनों तत्त्व विभिन्न अनुपातों में विद्यमान रहते हैं। अंतर केवल इतना है कि इनमें से कौन-सा तत्त्व उसके निर्णयों, मूल्यों और जीवन-दृष्टि का प्रधान नियामक बनता है।

समाज में जो वैचारिक द्वंद्व, मूल्य-संघर्ष, सांस्कृतिक मतभेद और जीवन-शैली की विविधता दिखाई देती है, उसके मूल में भी यही त्रिविध आधार कार्य करता है। जो व्यक्ति अभाव की दृष्टि से संसार को देखता है, उसके लिए सुरक्षा, संसाधन और उपलब्धि सर्वोच्च मूल्य बन जाते हैं। जो प्रभाव की दृष्टि से जीवन को देखता है, उसके लिए सामाजिक स्वीकृति, प्रतिष्ठा और समूह की मान्यता अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। किन्तु जो स्वभाव की दृष्टि से जीवन जीता है, उसके लिए सत्य, करुणा, आत्मसम्मान और आंतरिक स्वतंत्रता सर्वोच्च मूल्य बन जाते हैं। यही कारण है कि समान परिस्थिति में रहते हुए भी दो व्यक्तियों के निर्णय भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि उनके निर्णयों का स्रोत भिन्न होता है।

संस्कृति का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को अभाव से मुक्त करना, प्रभाव को विवेकपूर्ण बनाना और स्वभाव को प्रकाशित करना है। यदि संस्कृति केवल अभाव की पूर्ति का साधन बन जाए तो वह उपभोगवाद में परिवर्तित हो जाती है; यदि केवल प्रभाव का माध्यम बन जाए तो वह रूढ़ि और अनुकरण का रूप धारण कर लेती है; और यदि स्वभाव से विच्छिन्न हो जाए तो उसका आध्यात्मिक आधार समाप्त हो जाता है। इसलिए प्रामाणिक संस्कृति वह है जो अभाव को करुणा में, प्रभाव को विवेक में और स्वभाव को लोकमंगल में रूपांतरित कर दे। यही संस्कृति व्यक्ति को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाती है; केवल शिक्षित नहीं, संस्कारित बनाती है; केवल समर्थ नहीं, उत्तरदायी बनाती है।

अतः व्यक्ति और संस्कृति के संबंध का अध्ययन करते समय यह स्मरण रखना आवश्यक है कि संस्कृति बाहर से आरोपित वस्तु नहीं, बल्कि भीतर से प्रस्फुटित चेतना है। अभाव उसका प्रारंभ हो सकता है, प्रभाव उसका माध्यम हो सकता है, किन्तु स्वभाव ही उसका परम उत्कर्ष है। जिस समाज में व्यक्तियों का स्वभाव सत्य, करुणा, न्याय, सहअस्तित्व और आत्मानुशासन से आलोकित होता है, वहाँ संस्कृति केवल परंपरा नहीं रहती, वह जीवन का प्राण बन जाती है। वहीं दूसरी ओर जहाँ अभाव भय में, प्रभाव अंधानुकरण में और स्वभाव अहंकार में परिवर्तित हो जाए, वहाँ संस्कृति का बाह्य वैभव होते हुए भी उसका आंतरिक प्रकाश क्षीण होने लगता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आत्ममंथन आवश्यक है कि उसके जीवन का संचालन अभाव कर रहा है, प्रभाव कर रहा है अथवा उसका स्वभाव। इसी प्रश्न का उत्तर उसके चरित्र, उसके मूल्य, उसकी संस्कृति और अंततः उसके समग्र जीवन के स्वरूप का भी उत्तर है।

डॉ रजनीश मिश्र 

देवरिया, उत्तर प्रदेश 

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