सावधान! इस्लाम का नया पैंतरा ॥


सावधान ! इस्लाम ने एक नया पैंतरा खेला है और अपने को सबसे प्राचीन और सनातन धर्म होने का दावा किया है और यहीं तक नही ॐ और अल्लाह को भी एक मान लिया है दिल्ली के रामलीला मैदान में खड़े होकर मदीना की तर्ज पर नाम में मदनी लगाने वाले महमूद मदनी ने दावा किया कि इस्लाम भारत का सबसे प्राचीन मजहब है। अगर महमूद मदनी यह बोल रहे हैं तो इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। महमूद मदनीदेओबंदी मुसलमानों की सबसे ताकतवर संस्था जमीयत  उलमा  हिन्द के मुखिया हैंजो 1919 के खिलाफत मूवमेन्ट से पैदाहुआ इस्लामिक संगठन है। इसका बुनियादी काम मुसलमानों को सच्चा इस्लाम पहुंचाकर उनको ताकतवर बनाना है। जमीयत--उलमा--हिन्द भारत के सबसे धनी इस्लामिक संगठन के रूप में काम करता है जिसे हलाल सर्टिफिकेटमस्जिदों में इमामोंकी तैनाती तथा चंदे के रूप में भारी भरकम धन मिलता है। दिल्ली के आईटीओ चौराहे पर इनका विशाल कार्यालय है। देशभर कीअधिकांश सुन्नी मस्जिदों में इन्हीं के द्वारा इमाम नियुक्त किये जाते हैं। महमूद मदनी इसी जमात के अध्यक्ष हैं। वह राजनीतिकरूप से बहुत सक्रिय हैंइसलिए राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी बलवती रही हैं। कांग्रेस के समर्थन से राज्यसभा सदस्य भी रह चुकेहैं। कांग्रेस की सरकारों में वह मुस्लिम प्रतिनिधि के तौर पर सलाह मशविरा भी देते रहे हैं। लेकिन जब से भाजपा की सरकारआयी हैमदनी अघोषित रूप से मोदी पर हमलावर रहते हैं। वह ऐसा मानते हैं कि मोदी के आने के कारण देश में मुसलमानों केखिलाफ माहौल बना है। इसलिए नुपुर शर्मा के बयान वाले मामले में महमूद मदनी ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करके अरब देशोंको भड़काने का काम भी किया था। अंततमदनी की योजना के सामने मोदी झुक गये और नुपुर शर्मा को पार्टी से बाहर निकालदिया। लेकिन दिल्ली के रामलीला मैदान में मदनी ने जो बोला है वह इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसा है। मदनी ने प्रमुख रूपसे तीन बाते कहीं हैं। पहलाइस्लाम भारत का सबसे प्राचीन मजहब हैदूसरामुसलमान कहीं बाहर से नहीं आये बल्कि यहीं केहैंऔर तीसरा कि इस्लाम को बाहर का मजहब कहना बंद होना चाहिए। ये तीनों ही बातें इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसी हैंजिसे सुनकर हो सकता है कि कुछ लोगों को हंसी भी आये लेकिन जो इस्लाम को समझते हैं वो मदनी की बातों की गंभीरता कोभी जरूर समझेंगे।

इस्लाम की शुरुआत को लेकर ऐतिहासिक रूप से कोई तथ्य उपलब्ध नहीं है। जो कुछ है वह इस्लामिक सोर्स से ही समझा जासकता है। इस्लाम का सबसे पहला सोर्स है इब्ने हिशाम द्वारा आठवीं सदी में लिखी गयी 'सीरत उल नबवी।ऐसा समझा जाता हैकि इब्न  हिशाम ने सीरत उल नबवी लिखने के लिए इब्न  इशाक की अल सीरत अल नबवी का सहारा लिया था। इब्न इशाक सातवीं सदी के बताये जाते हैं। फिर भी इब्न इशाक की बजाय इब्न  हिशाम को ही इस्लाम का प्रामाणिक इतिहासकारमाना जाता है। उसी के समकालीन तबरी और इब्न  कतीर भी इस्लाम के इतिहासकार के रूप में माने जाते हैं। इब्न  इशाकतबरी और कतीर ने आठवीं सदी में जो लिखा वही इस्लाम की बुनियाद बन गया। इसी के आधार पर हदीसें लिखी गयीं। यह सबअब्बासियों के शासनकाल के दौरान किया गया या कराया गया। इस्लाम के इन प्रामाणित स्रोतों में जो कहा गया है उसकेमुताबिक सातवीं सदी में अरब में एक पैगंबर आये जिन्होंने एक नया दीन शुरु किया। उनके ऊपर आसमान से बही उतरती थी जोमुसलमानों के लिए कुरान के रूप में आज मौजूद है। ये सब बातें कितनी सच हैं और कितनी झूठ इसको प्रमाणित करने का कोईजरिया मानव जाति के सामने नहीं हैं। मुसलमान इसी को सच मानते हैं और इसी के मुताबिक जीवन जीते हैं। लेकिन अब्बासियोंके समय तारीखतफ्सीर और हदीसों (इतिहासविवरणऔर प्रमाणके जरिए जो इस्लाम गढ़ा गया उसमें बहुत चालाकी से उसेयहूदियों के अब्राहम (इब्राहिमसे जोड़ दिया गया। अपने इस नये सेक्ट को प्रामाणिक बनाने के लिए अब्बासियों ने इसे मोजेज(मूसाऔर जीसस (ईसाकी निरंतरता वाला मजहब बता दिया। जबकि इस नये मजहब का  तो अब्राहम से दूर दूर तक कोईलेना देना था और  ही मोजेज या जीसस से। लेकिन अपने आपको यहूदियों या ईसाइयों जैसा प्राचीन मजहब साबित करने केलिए यह चाल खेली गयी और कामयाब रही। इस्लाम को जो लोग प्रसारित कर रहे थेउनके सामने सबसे बड़ा संकट ये था किइस्लाम के पास कोई दार्शनिक आधार नहीं था। उनके पास अपनी कोई फिलॉसफी नहीं थी इसलिए जहां से जो सुना उसे इस्लाममें मिला लिया। बाइबिल और तोरा के किस्सेगिंजा रब्बा की कहानियां सब कुरान और इस्लाम का हिस्सा बना ली गयीं। औरकहा गया कि ये कुरान उनके अपने अल्लाह का कलाम है। यहूदी इतनी बड़ी संख्या में थे नहीं कि वो इसका विरोध कर पाते औरकहते कि उनके अब्राहम या मोजेज को मोमिन अपना क्यों बता रहे हैं। गिंजा रब्बा के मानने वाले भी इतने कम थे कि उनके विरोधकरने का कोई सवाल ही नहीं था। लेकिन जो लोग इस्लाम को एक दीन के रूप में गढ रहे थे उन्होंने इधर उधर से जुटाई गयीजानकारियोंस्थानीय परंपराओं और कहानियों को इस्लाम बनाकर उसे मुकम्मल घोषित कर दिया। इसी की निरंतरता भारत मेंतब दिखी जब आर्य समाज को चुनौती देने तथा हिन्दुओं को मूर्ख बनाने के लिए मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी ने कहना शुरुकिया कि भारत में पैदा होने वाले कृष्ण भी एक पैगंबर थे और वह खुद इस्लाम का एक पैगंबर है। हिन्दुओं को तो समझ ही नहींआया कि कादियानी क्या कह रहा है लेकिन मुसलमानों ने उसको गैर मुस्लिम घोषित कर दिया। मुसलमान अपने पैगंबर मोहम्मदको पहला और आखिरी पैगंबर मानते हैं। उन्हीं ने इस्लाम को शुरु किया और उन्हीं के दौर में इस्लाम मुकम्मल हो गया। इसके बादअब इस्लाम में कोई पैगंबर नहीं आयेगा। मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी को मुसलमानों ने भले ही जहन्नमी घोषित कर दिया होया फिर उसके मानने वालों को काफिर कहते हों लेकिन उसके द्वारा बनायी गयी कई झूठी कहानियां इस्लाम में फैल गयी। इसमेंबुढ़िया द्वारा उनके पैगंबर पर कूड़ा फेंकने वाली कहानी तथा इस्लाम का सबसे प्राचीन धर्म होनेवाली कहानी भी शामिल है। यहगुलाम अहमद कादियानी ही था जिसने इस्लाम को सनातन धर्म बताया था और इसी को प्रमाणित करने के लिए राम और कृष्णको भी भारत में पैदा हुए पैगंबर बताया था।

मिर्जा वही तरीका इस्तेमाल कर रहा था जो अब्बासियों के दौर में इब्ने हिशाम ने इस्तेमाल किया था। यहूदी धर्म की परंपरा वालासाबित करने के लिए उसने इस्लाम को अब्राहमिक परंपरा से जोड़ दिया था। मिर्जा गुलाम अहमद ने यही काम सनातन धर्मजितना पुराना दिखाने के लिए किया। कादियानी मुसलमानों को वाजिबुल कत्ल मानने वाले मुसलमान भी कादियानी की उसथ्योरी को सही मानने लगे हैं कि इस्लाम असल सनातन धर्म है लेकिन मोहम्मद उसके आखिरी पैगंबर हैं।


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