विवाह से ग़ायब हो रहां ‘अगुआ परंपरा’
विवाह के समय एक बिचौलिया रखा जाता है। भोजपुरी में इसे अगुआ कहते हैं। समाज की हर जाति में ऐसे अगुआ पाये जाते हैं जो शादी विवाह का संबंध बनाने में मजबूत भूमिका निभाते हैं।
ये अगुआ बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसकी पहली खासियत ये होती है कि दोनों पक्षों को जानता है। दोनों पर इसका प्रभाव रहता है। कोई शिकायत होने पर दोनों इसे ही पकड़ते हैं। विवाह के समय और उसके बाद भी यह एक ऐसा मध्यस्थ होता है जो रिश्तों में आनेवाली दरार को भरता है।
फिर समय के साथ ये कहां गायब हो जाता है, कुछ पता नहीं चलता। समाज ऐसे ही अपने अनुभव से सोच समझकर व्यवस्थाएं बनाता है। एकदम से अंधे कुएं में छलांग लगाना ये तो यूरोपीय मन मानस में ढल गये लोगों का दुस्साहस है। भारतीय समाज अपनी व्यवस्थाओं में रिस्क फैक्टर की पहचान करके उसका निदान करना जानता है।
लेकिन इन बातों को जरा सा अंग्रेजी पढते ही हम रुढिवादी और दकियानूसी मानने लगते हैं। हमारे अंदर मॉडर्निटी का ऐसा भूत घुस जाता है कि हम बिना सोचे समझे अपनी सामाजिक व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने में लग जाते हैं।
लव मैरिज तो अतिवाद हो गया। उसके अलावा भी मैरिज ब्यूरो, मैट्रिमोनियल साइट्स ये सब अंधे कुएं जैसे ही होते हैं। वो अपने लाभ के लिए विवाह का व्यापार करते हैं। उन्हें इससे मतलब नहीं होता कि इसके बाद दोनों का क्या होगा? उन्हें अपनी सर्विस फीस से मतलब होता है, बाकी तुम जानों, तुम्हारा काम जाने।
विवाह को लेकर हम सामाजिक रूप से जितने संवेदनशील थे, अब उतने ही असंवेदनशील होते जा रहे हैं। कुछ धूर्त प्रकृति के लोगों ने किसी मॉडर्निटी के नाम हमारी हर व्यवस्था को रुढिवादी बता दिया, जो नहीं बताया वो यह कि यह मॉडर्निटी एक अंधा कुआं है। इसमें गिरने वाला व्यक्ति लौटकर फिर कभी वापस नहीं आ पाता।
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