शिक्षा जिसमें मनुष्यता का अभाव


शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है आदमी को मनुष्य बनाना लेकिन यूरोप के मशीनीकरण और औद्योगिक क्रांति के बाद जो मनुष्य कि नस्ल तैयार हूयी वह शारीरिक रूप से आदमी थी लेकिन मानसिक रूप से मशीन के रूप में तैयार हुआ है और उससे उपंजी एक क़ौम

जिसमें एक विशेष शौक़ है वह है बुद्धिजीवी दिखने का!

बुद्धि हो  होबुद्धिजीवी दिखने में कुछ लोग कोई कसर नहीं छोड़ते। जैसेकुछ समय पहले तकजब मोबाइल कैमरा नहीं आया थातब स्टुडियो जाते थे। बाकायदा ड्रेस कोड बनाते थे। इस ड्रेस कोड में चाहे पैंट शर्ट हो या फिर पाजामा कुर्ता। उस पर सदरी जरूर होतीथी। फिर एक हाथ में कलम लेकर उसी हाथ को ढुड्डी से टिकाकर बैठते थे। फिर होता था क्लिक और बन जाते थे बुद्धिजीवी। मोबाइलकैमरा  गया तो थोड़ा तरीका बदल गया है। अब चिंतकविचारक की भी अलग अलग मुद्राएं भी चलन में  गयी हैं। एक खासअंदाज में बैठने से आप विचारक लगते हैं। किसी और खास अंदाज में बैठने से आप चिंतक हो जाते हैं। फिर आसपास के किसी व्यक्तिको निर्देश मिलता है कि इस पोज में एक फोटो निकालो। कोई  मिला तो आत्मनिर्भर भारत तो हो ही रहा है। खुद सेल्फी सेट कर लेतेहैं। इस तरह फोटो निकलता है। किसी एप्प के सहारे थोड़ा टीप टॉप किया जाता है और फिर सोशल मीडिया पर शेयर हो जाता है, "फलाना मुद्दा पर गंभीर चिंतनकरते हुए। 

जिन लोगों को लगता है कि इक्कीसवीं सदी में विचारकबुद्धिजीवीचिंतक इत्यादि कैसे बना जाए उन्हें ऐसे लोगों से प्रशिक्षण लेनाचाहिए। इंस्टंट बुद्धिजीवी मेकर भी होते हैं ऐसे लोग।

भारतीय दृष्टिकोण से देखा जायँ तो जीवन में औसत रहने का प्रयास करना चाहिए। ये टॉप पर चढनेवाला जीवन दर्शन हमारा अपनानहीं है। ये यूरोप के लोग भारत में लेकर आये। वही हैं जो हमें सिखाते हैं कि नंबर वन होना चाहिए। सर्वाइवल आफ  फिटेस्ट ही चलताहै संसार में। इसके मूल में जाएंगे तो पायेंगे कि यह एक आक्रमणकारी विचार है। अंग्रेजी में कहें तो conquering ideology. लोगोंको परास्त करनाउन्हें हराना और फिर सबको हराकर शीर्ष पर पहुंच जानाये विचार तो भारत का हो ही नहीं सकता। हम ऐसे सोचतेही नहीं। हमारी मूल सोच सामूहिकता वाली है। 

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।


          हम सबको साथ लेकर चलते हैं। या फिर कह सकते हैं कि हम लोग साथ साथ चलते हैं। कोई पीछे रह गया तो रुक कर उसेसाथ ले लेते हैं। यह सोच  होती तो सर्वे भवन्तु सुखिनवाली दर्शन  निकलता। सब सुखी रहेंगे तो हम भी सुखी रहेंगे। फिर ये टॉप परजानेवाली मानसिकता को हमने कैसे आदर्श मान लियाये तो एक निकृष्ट विचार है। आपने कभी सोचा है जिसे परास्त करके आपविजेता बनते हैं उस पर क्या बीतती होगीदूसरों को हराकर स्वयं विजेता बनना कोई मानवीय सोच तो नहीं कही जा सकती। हम जिसेलेकर बहुत उद्वेलित रहते हैं वह अगड़े पिछड़े की सोच भी इसी यूरोपीय मानसिकता से ही पैदा होती है। दूसरों को परास्त करके स्वयंविजेता बन जाने वाला मानस हमारा अपना नहीं है। कम से कमपारिवारिक और सामाजिक सामाजिक जीवन में इस विचार का सर्वथात्याग करना चाहिए। यह विचार मनुष्य को राक्षस और म्लेक्ष बना देता है। 

जीवन में सहज रहना चाहिए। सम रहना चाहिए। अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। यही भारतीय जीवन दर्शन है। यही भारत कामन मानस। इससे परे जाकर हम जो कुछ बनना चाहेंगे उससे सिर्फ दुख पायेंगे।

हम लोग ऐसा मानते हैं कि पढाई वाली परीक्षा में जो टॉप करते हैं वो शायद जीनियस होते होंगे। क्या सचमुच वो लोग जीनियस होते हैंअगर होते हैं तो फिर जीवन में ऐसा कोई काम क्यों नहीं कर पाते कि उनका नाम संसारभर में रोशन हो जाए

आमतौर पर हम लोग देखते हैं नाम रोशन करनेवाले काम हमेशा पढाई में औसत रहे लोग ही करते हैं। जीवन में जितने बड़े नाम होते हैंउनका पढाई वाला औसत बहुत खराब ही पाया जाता है। फिर भी हमें लगता है कि बच्चा थोड़ा अच्छा नंबर लायेऔर टॉप कर जाए तोजीवन सफल हो जाए। 

पढाई में टॉप करनेवाले लोगों में आमतौर पर दो गुण या फिर दुर्गुण होते हैं। पहलाउनकी मेमोरी बहुत अच्छी होती है और दूसरा वोबोली गयी बात को फॉलो करने में कोई कोताही नहीं करते। यानी उन्हें कहा जाए कि ये किताब पूरी रट लेनी है तो वो रट लेते हैं। वो येदिमाग ही नहीं लगाते कि क्यों रट लेनी हैफिर क्योंकि मेमोरी पॉवर स्ट्रांग होती ही है इसलिए अच्छे नंबर पा जाते हैं। टॉप भी कर जातेहैं। जीवन का अनुभव ये बताता है कि संसार में दो ही लोग सबसे ज्यादा दुखी होते हैं। पहले वोगुलाम बनकर जीवन जीते हैंदूसरा वोजिनकी मेमोरी बहुत अच्छी होती है। अच्छी मेमोरी एक प्रकार से गुण है तो दूसरे प्रकार में दुर्गुण भी है। अगर आप अपनी यादों काबेहतर प्रबंधन नहीं कर सकते तो ये यादें आपका सत्यानाश कर देती हैं। बुद्धि का व्यवहार ऐसा है कि वह सकारात्मक बातों को ज्यादादेर तक संभालकर नहीं रखता। नकारात्मक बातों को बहुत देर तक संभालकर रखता है। ऐसे में अच्छी मेमोरी वाला व्यक्ति अपने बुरेअतीत से पीछा नहीं छुड़ा पाता। 


अगर आप मुझसे पूछें कि इस समय दुनिया में सबसे खतरनाक विचारधारा कौन सी है तो मैं कहूंगा कैरियरवाद। इस समय संसार मेंजितने भी तरह के वाद हैं उनमें यह कैरियकवाद सबसे खतरनाक है। 

कैरियरवाद से प्रभावित व्यक्ति  केवल अपने आप को नष्ट करता है बल्कि अपने कैरियर के लिए अपने आसपास के लोगों को भीनुकसान पहुंचाता है। उसके सामने एक छद्म लक्ष्य होता है जिसे पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार होता है।उसके दिमाग में येबात भरी होती है कि जीवन में एक बार कैरियर बन जाए तो सबकुछ बन जाएगा। लेकिन क्या व्यावहारिक तौर पर ऐसा होता हैअगरउनकी धारणा बिल्कुल ठीक है तो फिर कैरियरिस्ट या फिर कैरियरवादी लोग जीवन में सबसे ज्यादा दुखीपरेशानडिप्रेस्ड लोग बनकरक्यों रह जाते हैं


असल में ये सब इस यूरोपीय आधुनिकता के साइड इफेक्ट हैं जो दिमाग को हैकर होता है। अच्छे भले आदमी का दिमाग हैक करकेउसके सामने जीवन के वो लक्ष्य रख देता है जिसका उसके वास्तविक जीवन में कोई मूल्य ही नहीं होता। उसे ये समझाया जाता है किजीवन में कैरियर और पैसा ही सबकुछ है। ये नहींतो जीवन में कुछ भी नहीं। उसके सफलता का बोझ कैरियर और पैसे में निहित होताहै। मुझे आज तक कोई ऐसा कैरियर वादी मनुष्य नहीं मिला जो सहज सरल होता है। जिसके भीतर कोई खास मानवीय गुण मिलताहो। उसके भीतर भांति भांति के दुर्गुण ही पाये जाते हैं। एक अच्छा मनुष्य होने के लिए जिन बातों का निषेध समझा जाता है एककैरियरवादी उन्हीं बातों के आधार पर अपना जीवन गढता है। हांअगर कोई व्यक्ति किसी मोड़ पर कैरियरवाद की बजाय मानवीयमूल्य को महत्व दे देता है तो वही उसके कैरियर पर ब्रेक लग जाता है। उसका ग्रोथ वहीं रुक जाता है। इस विकास युग में आप तभी तकसफल है जब तक आप क्रूरअमानवीयमक्कार और धूर्त हैं। जैसे ही इन दुर्गुणों को छोड़ने लगते हैं आप इस आधुनिकता में असफलघोषित हो जाते हैं।

शिक्षित लोग हो सकता है बहुत योग्य डॉक्टरइंजीनियरसेल्समैनवकील या फिर ऐसा ही कुछ बन जाते हों लेकिन वो अच्छे मनुष्यनहीं बन पाते कभी। 


इस शिक्षा व्यवस्था का कैसा खोखलापन है कि जिसकी जितनी अधिक शिक्षा वह उतना ही बनावटी और खोखला मनुष्य। उसकेमुकाबले में जो कम शिक्षित हैंजिनके पास डिग्रियों का कोई भंडार नहीं है वो उतना अच्छा मनुष्य है। उसके भीतर मानवीय संवेदनाएंऔर सहज सरल जीवन जीने की कला एक पढे लिखे मनुष्य से ज्यादा होती है।मैं आज तक यह बात यह बात समझ नहीं पाया कि यहशिक्षा जिसे प्राप्त करने के लिए हमें बहुत बचपन में झोंक दिया जाता है उससे हमें मिलता क्या हैएक खोखला जीवनएक बनावटीजीवनशैलीएक गुलाम मानसिकता ? क्या ये सब शिक्षा की उपलब्धि होती है

मैं तो मानता हूं जो अशिक्षित हैं उनमें मनुष्य बने रहने की संभावना बची हुई है। जिन्होंने ये शिक्षा पा ली वो और कुछ हो जाएंएक अच्छामनुष्य होने की संभावना खो देते हैं।


खैरमेरा दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। संसार में कोई  तो सफल है और  असफल।  कोई बड़ा है और  छोटा। सब अपनी अपनीक्षमता अनुसार ठीक वहीं पर हैं जहां उन्हें होना चाहिए। वह कुछ पढे या  पढे। पांचवी फेल भी महान विचारक हो सकता है औरपीएचडी करनेवाला भी महामूर्ख। आज की स्कूली शिक्षा यूरोप की सोच से निकली है। मैं व्यक्तिगत स्तर पर इसको बहुत महत्व नहींदेता।

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