हिजाब :-दोहरा चरित्र
जब मोमिना को बुर्का, चदरी, हिजाब, शरीयत वाली मर्द की गुलामी ही चाहिए तो फिर ये रो क्यों रही हैं? यहां भारत में मुस्लिम महिलाएं काले तंबू की लड़ाई लड़ती हैं, इस्लाम के नाम पर निकाब, हिजाब बुर्का को आजादी और हक बताती हैं। लेकिन अफगान तालिबान ने यह आजादी और हक अनिवार्य कर दिया तो रोने बैंठ गयीं? मुस्लिम महिलाओं का ये दोहरा चरित्र क्यों? क्या अफगानिस्तान में सच्चा इस्लाम नहीं आया है? अगर आया है तो फिर ये रोना धोना क्यों? जो आपको चाहिए वह बिना मांगे मिल रहा है तो फिर खुश होने की बजाय रो क्यों रहे हैं? अफगानिस्तान के सद्गुण मंत्रालय ने एक व्यापक विचार विमर्श के बाद निर्णय लिया है कि अफगानिस्तान में कोई महिला बिना बुर्का पहने घर से बाहर नहीं निकलेगी। अगर कोई महिला बिना बुर्के के पायी जाती है तो उसके पति या पिता को तीन दिन की जेल की सजा दी जाएगी। तालिबान प्रशासन ने ये फैसला कुरान और सुन्नत की रोशनी में लिया है कि घर से बाहर निकलने पर महिला का चेहरा या उसके शरीर का कोई अंग दिखता है तो इसे गैर इस्लामिक काम माना जाएगा और इसकी सजा उसके साथ उसके परिवार के मर्दों को भी दी जाएगी। मैं उम्मीद करता हूं कि भारत के फ्री थिंकर, लिबरल, कम्युनिस्ट और इस्लामिस्ट तालिबान के इस फैसले का स्वागत करेंगे। बुर्का और हिजाब का उनका अभियान भारत में भले ही पूर्ण रूप से सफल नहीं हो पाया लेकिन अफगानिस्तान ने उनकी इच्छाओं को पूर्ण कर दिया है। जो मोमिनीन भारत में रहकर हिजाब या बुर्के की गुलामी नहीं कर पा रही हैं, उनके लिए तालिबान ने अपने जन्नत के दरवाजे खोल दिया है। वो चाहें तो अफगानिस्तान जाकर जन्नत वाली जगह मुकम्मल कर सकती हैं।
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