क़ुतुबमिनार :विजयस्तंभ या ध्रुवस्तंभ
वर्तमान समय में एक विमर्श पूरे देश में चल रहा कि क़ुतुबमिनार विजय स्तम्भ है या ध्रुव स्तंभ ,जब एक तथा कथित इतिहासकार से इस 'मीनार' को बनवाने का उद्देश्य पूछा गया तो उत्तर मिला कि यह एक विजय स्तम्भ है। किसनेकिस पर जीत हासिल की थी? मोहम्मद गोरी ने राय पिथौरा (पृथ्वीराज) पर जीत हासिल की थी। तब जिज्ञास बस कुछ प्रश्न अपनेआप मन में खड़ा हो जाता है
प्रथम प्रश्न ,कहां जीत हासिल की थी? पानीपत के पास तराइन में।
विजय स्तम्भ को गोरी ने शुरू करवाया था क्योंकि दिल्ली उसकी राजधानी थी। लेकिन गोरी ने दिल्ली में कभी अपनी राजधानी नहींबनाई क्योंकि उसकी राजधानी तो गजनी में थी। फिर दिल्ली में विजय स्तम्भ बनाने की क्या तुक थी? कोई जवाब नहीं।
अगर इमारत को गोरी ने शुरू कराया था तो इसका नाम गोरी मीनार होना चाहिए, कुतुब मीनार नहीं। इसे कुतुब मीनार क्यों कहा जाताहै। इसके जवाब में कहा जाता है कि इस इमारत का निर्माण शुरू करने वाला कुतुबद्दीन एबक मोहम्मद गोरी का गुलाम था और उसनेअपने मालिक के लिए इसकी नींव रखी थी।
अगर यह तर्क सही है तो उसने विजय स्तम्भ के लिए दिल्ली को ही क्यों चुना? उत्तर है कि दिल्ली कुतुबुद्दीन एबक की राजधानी थी।अब सवाल यह है कि इस मीनार का निर्माण गोरी के जीवनकाल में शुरू हो गया था, वह जीवित था तो फिर उसके गुलाम ने दिल्ली कोकैसे अपनी राजधानी बना लिया था?
एक मस्जिद में मुअज्जिन का टॉवर है जिस पर से अजान दी जाती थी और यह 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' से जुड़ा था। पर भारत केसमकालीन इतिहास में 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।इस शब्द को उन्नीसवीं सदी में सर सैय्यद अहमदखान ने गढ़ा था। इस बात को लेकर आश्चर्यचकित ना हों कि भारतीय इतिहास में 'कुतुब मीनार' जैसा कोई शब्द नहीं है। यह हाल केसमय का एक काल्पनिक तर्क है कि यह मीनार मुअज्जिन का टॉवर है। अगर ऐसा है तो मस्जिद का प्राथमिक महत्व है और टॉवर काद्वितीयक महत्व है।
दुर्भाग्य की बात है कि इसके पास एक मस्जिद खंडहरों में बदल चुकी है। लेकिन तब इसका मुअज्जिन का टॉवर क्यों शान से खड़ा है? इस सवाल का कोई जवाब नहीं। हकीकत तो यह है कि मस्जिद और मजीना एक पूरी तरह बकवास कहानी है।तथाकथित कुतुब मीनारऔर खंडहर हो चुकी जामा मस्जिद के पास मीनार को बनाने वाले एक नहीं हो सकते हैं। कुतुब मीनार एक बहुत अधिक पुराना टॉवर है।फिर मीनार पर कुरान की आयतों को क्यों अंकित किया गया है?
मीनार पर अंकित कुरान की आयतें एक जबर्दस्ती और निर्जीव डाली हुई लिखावट है जो कि पूरी तरह से हिंदू डिजाइन के सुंदरचित्रवल्लरी वाली धारियों पर ऊपर से लिखी गई हैं। कुरान की आयतों के लिहाज से इसे मुस्लिम मूल की ठहराना ठीक इसी तरह होगाजैसा कि किसी गैर-मुस्लिम का खतना कर उसे मुसलमान बना दिया जाए।यह मीनार वास्तव में ध्रुव स्तम्भ है या जिसे प्राचीन हिंदूखगोलीय वेधशाला का एक मुख्य निगरानी टॉवर या स्तम्भ है। दो सीटों वाले हवाई जहाज से देखने पर यह टॉवर 24 पंखुड़ियों वालेकमल का फूल दिखाई देता है। इसकी एक-एक पंखुड़ी एक होरा या 24 घंटों वाले डायल जैसी दिखती है। चौबीस पंखुड़ियों वालेकमल के फूल की इमारत पूरी तरह से एक हिंदू विचार है। इसे पश्चिम एशिया के किसी भी सूखे हिस्से से नहीं जोड़ा जा सकता हैजोकि वहां पैदा ही नहीं होता है।
इस इमारत की लम्बवत प्रोजेक्शन लाइन्स जो कि टॉवर की प्रत्येक स्टोरी के शीर्ष पर बनी पत्थरों पर बारीक कारीगरी के मध्य बिंदुओंसे लेकर इसके आधार पर बने क्षैतिज समधरातल पर एक कमल के फूल का निर्माण करते हैं जो कि टॉवर शीर्ष के ऊपर आसमान सेदेखा जा सकता है। ध्रुव स्तंभ का यह कमल के रूप में उठा हुआ भाग अतीत के किसी वास्तुविद या पुरातत्ववेत्ता के द्वारा सोचा याबनाया नहीं जा सकता है। आप कह सकते हैं कि ध्रुव स्तम्भ को मोहम्मद गोरी या कुतुबुद्दीन एबक का निर्माण बताने का कोई प्रश्न नहींहै। जिन सुल्तानों का इस मीनार के साथ नाम जुड़ा है, उन्होंने इसके आवरण को नष्ट कर दिया, जिन पत्थरों पर मनुष्य या पशुओं केआकार बने थे, उन्हें उलटा कर दिया और इन पर अरबी में लिखावट को उत्कीर्ण कर डाला।
अब कुछ लोग ये अफवाह फैला रहे हैं कि अयोध्या में मंदिर के लिए किये जा रहे समतलीकरण में बौद्ध अवशेष मिल रहे हैं। जैसे ये धम्म चक्र। ये धम्म चक्र नहीं है। ये विष्णु स्तंभ है। धम्म चक्र में सिर्फ चौबीस पंखुड़िया या तीलियां होती हैं जबकि इसमें 29 हैं। धम्म चक्र में दो वृत्त नहीं होता। इसमें दो वृत्त है।
महरौली के ध्रुव स्तंभ (कुतुब मीनार) में भी ये अवशेष देखने को मिलते हैं। मंदिरों में बहुत सामान्य तौर पर इसे बनाया जाता है। अभी जो मंदिर का मॉडल तैयार हो रहा है उसके स्तंभों पर भी बनाया जाएगा। बुद्ध भारतीय हैं। उनके नाम पर जो निर्माण शैली विकसित हुई है वह भी भारतीय है। इसलिए वैष्णव औप बौद्ध मंदिरों के निर्माण में समानता होना स्वाभाविक है। फिर भी अंतर दिखता है। इसलिए लतफहमी फैलानेवाले सिर्फ माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। जो कि वो हमेशा करते ही रहते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें