बेरोज़गारी और वामपंथ
भारत में आज़ादी के बाद कमरेडो ने राजनैतिक महत्वकांक्षा के इतर अपने वर्ग विभाजन और सामवैधानिक व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए नीतिनिर्माण के माध्यम से एक आत्मविरोधी व्यवस्था बनाना था इस प्रयास में इन लोगों ने शिक्षा से लेकर तमाम क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जोविशुद्ध भारतीय चेतना के अनुकूल नही थी। इनका लक्ष्य था की आत्मबिरोधो से पूर्ण यह व्यवस्था स्वयं ही ध्वस्त हो जाएगी। अपने इस मंसूबे कोकामयाब करने के लिए इन लोगों ने समय समय पे अनेक माध्यमों और नितियो का प्रयोग किया इसी क्रम में नौकरी कॉमरेडों का सदैव से प्रिय विषयरहा । सत्तर अस्सी के दशक में जब फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह से कम्युनिस्टों के कब्जे में थी फ़िल्मों के माध्यम से रोज़गार के समस्या को परोसा गया औरउस तरह से लोगों का मानसिक बदलाव किया गया।उस समय फिल्मों में उन्होंने पढे लिखे आदमी को नौकरी की तलाश में लगा है ऐसा दिखाया। उसदौर की लगभग हर दूसरी तीसरी फिल्म में बीए पास नौजवान डिग्री लेकर नौकरी मांगता फिरता था।इसके बाद सोने पे सुहागा का काम किया जातिगतआरक्षण ने। सामवैधानिक यात्रा के प्रारंभ में नीति निर्मताओ का लक्ष्य जातिगत भेद को ख़त्म करना था इन कमरेडो ने इस खायीं को और गहराबनाया।जातिगत आरक्षण वालों ने सरकारी नौकरी को सामाजिक न्याय बनाकर खूब बेचा है। उनका यह धंधा दोहरा लाभ देता है। एक इससे उनकीजाति वालों का राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है और दूसरा जाति में निहित रोजगार को छोड़ने से कंपनियों को नये नये क्षेत्र में कारोबार का मौका मिलताहै। ये दो ऐसे कारण हैं जिससे पढा लिखा व्यक्ति का मतलब ये हो गया कि वह कहीं नौकरी करता हो। वरना भारत का समाज उद्योजक समाज रहा है।आज जिन जातियों को आरक्षण की लाइन में लगाया गया है कभी उन जातियों के हाथ में ही सारा उत्पादन तंत्र होता था। इस उत्पादन तंत्र को नष्टकरने के लिए विदेशी पैसे की मदद से इस देश में ब्राह्मणवाद फर्जी बहस खड़ी की गयी ताकि उस व्यवस्था को ही शोषक बता दिया जाए जिसव्यवस्था ने उन्हें संपन्न बना रखा था।
वरना भारतीय समाज में नौकरी बहुत निम्न विकल्प समझा जाता था। उत्पादन सर्वश्रेष्ठ कार्य होता था, फिर व्यापार और उसके बाद नौकरी। लेकिन अबइसको सामाजिक रूप से पलट दिया गया है। अब नौकरी को सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा जाता है, फिर व्यापार और उत्पादन तो कोई करना नहीं चाहता। वहकाम बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने अपने हाथ में ले चुके हैं।
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