भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्र

भारतीय संस्कृति यूनान, रोम, मिस्र, सुमेर और चीन की संस्कृतियों के समान ही प्राचीन है। कई विद्वान तो भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति मानते हैं।भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक व्यवस्थित रूप हमें सर्वप्रथम वैदिक युग में प्राप्त होता है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ माने जाते हैं। प्रारम्भ से ही भारतीय संस्कृति अत्यन्त उदात्त, समन्वयवादी, सशक्त एवं जीवन्त रही है,संस्कृति के विषय मे कुछ मौलिक बातें है जैसे:-
संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है, जो अनेक पीढ़ियों तक हस्तान्तरित होता रहता है। मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है, अत: वह अपने ज्ञान के आधार पर अपने सीखे हुए व्यवहार को आने वाली पीढ़ी को हस्तान्तरित कर देता है और इस हस्तान्तरण का आधार उस समूह की भाषा और उस समूह के द्वारा स्वीकृति प्राप्त प्रतीक या चिह्न होते हैं, जो कि अत्यन्त ही पवित्र समझे जाते हैं, और इन प्रतीकों के प्रति समूह की गहरी श्रद्धा होती है। हस्तान्तरणशीलता के कारण ही संस्कृति हज़ारों-लाखों वर्षों के बाद भी नष्ट नहीं होती है।
भारत में प्राचीन काल से राष्ट्रवाद के दो अभिन्न तत्व बताए गए हैं- समान भूमि तथा समान सांस्कृतिक जीवन। भारत भूमि के प्रति जन के अटूट संबंध की अवधारणा को अत्यन्त महत्व दिया गया है। अत: राष्ट्र का आधारभूत तत्व भौगोलिक तथा सांस्कृतिक एकता को माना गया है। राष्ट्र का शरीर इसकी भूमि तथा इसकी आत्मा, संस्कृति है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि "राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है "
राष्ट्रवाद की मूल परिकल्पना को समझने के लिए देश, राज्य तथा राष्ट्र की परिकल्पना को अलग-अलग समझना आवश्यक है।देश एक भौगोलिक इकाई है तथा राज्य देश का राजकीय अथवा शासकीय घटक है। देश में एक अथवा एक से अधिक राज्य भी हो सकते है। जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है, जिसके लिए मात्र भूमि, मनुष्य एवं शासन पर्याप्त नहीं है अपितु सांस्कृतिक एकता की अनुभूति आवश्यक है। देश राष्ट्र के शरीर का एक भाग हो सकता है, जबकि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है। राष्ट्र, स्थिर व चिरंतर है जबकि राज्य अस्थिर हो सकता है अथवा बदल भी सकता है। अपने देश एवं उनकी परंपराओं के प्रति, उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति, उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति जिसकी अव्यभिचारी एवं एकांतिक निष्ठा हो वही लोग राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रवादी कहे जाते हैं।
साम्राज्यवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों का मानना है कि भारत में राष्ट्रवाद का जन्म ब्रिटिश उपनिवेशवाद के एक प्रतिक्रिया के रूप में हुआ, विशेषकर कांग्रेस की स्थापना के पश्चात। उससे पहले भारत में राष्ट्रवाद का कोई अस्तित्व नहीं था। लेकिन यह गलत धारणा है दरअसल भारतीय राष्ट्रवाद मूल रूप से यूरोपियन राष्ट्रवाद से भिन्न है, राष्ट्रवाद की यूरोपीय अवधारणा और मूल भारतीय राष्ट्रवाद में जमीन-आसमान का अंतर है। यूरोपीय राष्ट्रवाद की उत्पत्ति ही चेतना के क्रमिक आध्यात्मिक विकास से न होकर चर्च के तानाशाही रवैये के खिलाफ और औपनिवेशिक शक्तियों को उखाड़ फेंकने की प्रक्रिया के रूप में हुई थी। अमेरिकी क्रांति इसका उदार चेहरा थी, जबकि यूरोप के पुनर्जागरण और फ्रांसीसी क्रांति और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जर्मन राष्ट्रवाद इस किस्म के राष्ट्रवाद का उद्गम स्रोत रहे। राष्ट्रवाद की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार राष्ट्र ऐसे लोगों के समूह से बनता है जो समान भाषा, समान पंथ या समान इतिहास के हों और साथ ही उनमें एक गृहक्षेत्र और शासक के लिए समर्पण और एकता का भाव हो। इस आधार पर तो भारत कभी राष्ट्र की उस परिभाषा पर खरा ही नहीं उतर सकता,।
किंतु भारत प्राचीन काल से ही राष्ट्र के रूप में अवस्थित है
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारत नाम भारती यत्र संततिः।।

विष्णु पुराण में वर्णित यह श्लोक स्पष्ट रूप से भारत को एक भौगोलिक राष्ट्र के रूप स्थापित कर रहा है।भारत मे जितने ऐतिहासिक महापुरुष हुए।राम से लेकर शंकराचार्य तक सबने भारत को एक राष्ट्र के रूप में ,एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में मान्यता दी है।कुमार सम्भवम के मंगला चरण में कालिदास ने भी भारत को एक भौगोलिक एव एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में मान्यता दी है और लिखा है

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पुर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।

जब यूरोप में आदिम सभ्यता अपने चरम पर थी। प्लेटो या संत ऑगस्टाइन ने नारी मुक्ति या दास प्रथा खत्म करने के बारे में सोचा भी नहीं था, जबकि भारत में अशोक ने इसे राज्य की नीति का प्रमुख हिस्सा बनाया। भारत दुनिया से जो कुछ साझा करता है वह है दस हजार साल से ज्यादा की समान वेद-उदभूत सोच, जीवन पद्धति, समान जीवन दर्शन, दक्षिण के शंकराचार्य का पूरे भारतवर्ष के चारों कोनों में पीठ की सर्वमान्य संस्था।
सात पवित्र नदियां जो देश के अलग अलग भागों में बहती है, सात पवित्र पुरियां जो देश के अलग अलग भागों में स्तिथ हैं, 52 पवित्र तीर्थ जो पूरे भारतीय उपमाद्वीप को कवर करते हैं, आदि। इन स्थानों की यात्रा करना हिंदू अपना एक धार्मिक ऋण मानता है, वास्तव में भारतीय राष्ट्रवाद को ही प्रतिबिंब करता है। यदि यह भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है तो हिंदू किसी तीर्थ को भारत से बाहर क्यों नहीं मानता?
यहां तक जातक कथाओं में बुद्ध जैसे उदार मन पुरुष ने भी कहा था कि निर्वाण प्राप्त करने का सौभाग्य जम्बूद्वीप के लोगों को ही है। बौद्ध धर्म में आज भी जम्बूद्वीप एक अति पवित्र कॉन्सेप्ट है। हालांकि यह बात अलग है कि विदेशी बौद्ध चिंतकों ने यह मान लिया कि जम्बूद्वीप का अर्थ यह सम्पूर्ण पृथ्वी है।
जैन ग्रंथों में भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों का पूरा विवरण दिया है पर भारतीय उपमाद्वीप के बाहर के किसी क्षेत्र का विवरण नहीं दिया, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद का एक उदाहरण है।।
डायना इक, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय की एक फेलो और एक बेहद ही प्रभावशाली बुद्धिजीवी हैं, ने कई बार भारत की यात्राएं की और प्राचीन संस्कृति का अध्ययन किया। उसने अपनी किताब India: A Sacred Geography में यह साबित करने की कोशिश की कि राष्ट्रवाद की मानक परिभाषा के अनुसार देखे तो प्राचीन भारतीय संस्कृति में राष्ट्रवाद इनबिल्ट है।
वह आगे कहती हैं "अपने लंबे इतिहास को ध्यान में रखते हुए भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक एकता को कुछ समय हुआ लेकिन एक राष्ट्र के रूप में इसकी एकता इसके पवित्र भूगोल द्वारा दृढ़ता से गठित की गई है ।इसके पहाड़ ,जंगल ,नदियां, हिंदुओं के साथ-साथ अन्य भारतीय बौद्ध ,मुस्लिम, ईसाई, सिख सब के लिए पवित्र भूमि हैं ।भारतीय ग्रामीण हिंदुओं द्वारा भारत के मिट्टी में देवत्व का निवास स्थान माना जाता है तथा इनका दैवीय शरीर के रूप में पूजन होता है ।भारतीय परिदृश्य की विशेषताओं को उसका भौतिक विशेषताएं समझा जाता है यह परिदृश्य मृतप्राय नहीं बल्कि जीत है और तीर्थ स्थानों से भरी पड़ी है और यहां के विभिन्न स्थान तीर्थ यात्रा के पटरियों से जुड़े हुए हैं "।।

गांधी की परिकल्पना का भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक उत्थान की सीढ़ी का पर्याय है और शायद टैगोर भी इस बात को समझ नहीं पाए। आध्यात्मिक उत्थान के बिना लाया जाने वाला यूरोपीय सोच वाला राष्ट्रवाद आखिरकार फासीवाद की ओर ही ले जाता है। गांधी और पंडित दीनदयाल दोनों ही इससे अलग नजरिये वाले राष्ट्रवाद की हिमायत करते थे जो व्यष्टि से समष्टि तक जाता है। इसके मुताबिक आत्म-उत्थान के विभिन्न चरणों में राष्ट्रवाद भी एक पड़ाव भर है जिसकी परिणति अंत में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के रूप में होती है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि आज हम वसुधैव कुटुंबकम की बात कम और उस सेक्युलरिज्म की ज्यादा करते हैं जो भारत से सर्वथा भिन्न परिस्थितियों में यूरोप में उपजी है।

रजनीश मिश्र
शोधछात्र-काशी हिंदू विश्वविद्यालय

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