भारतीय संस्कृति और वैज्ञानिक स्वभाव

पुर्णमासी का ब्रत रखने से कैंसर कभी नही होगा।अब चूँकि आप बहुत बुद्धिजीवी और पढ़े लिखें हैं तो मेरे इस तरह के सनातनी बकवास पर मुझ पर हँसेंगे। परन्तु मत हँसिये यही सिद्ध करके एक जापानी वैज्ञानिक ने मेडिसिन मे नोबेल झटक लिया। और हमारी यह सदियों की परम्परा होते हुए भी हमे बड़ी चतुराई से सनातन से अलग करके पश्चिम के अंधेरे जीवन पद्धति मे ठेलदिया गया।
उस वैज्ञानिक ने इस पुर्णमासी ब्रत को अटोफैगी नाम देकर भारत की इस विधापर अपना कब्जा करलिया। ब्रत तैवहार तो भारत की परम्परा है। हमारे मनीषियों ने एकादसी,अमौस्या, पुर्णिमा और ग्रहण पर अनिवार्य ब्रत की परम्परा रखा था मगर हम ही विमुख होगये। पूर्ण मासी पर ब्रत का तरीका एक दिन पहले से एक दिन बाद तक है। 72 घंटे के उपवास मे केवल जल ग्रहण कर सकते हैं मगर बीच वाले दिन जल भी नही लेना है। जापानी वैज्ञानिक ने कहा कि चूँकि हर मनुस्य मे कैंसर कोशिकाएं पायी जाती हैं तो पूर्ण चन्द्र चक्र यानी पुर्णिमा के दिन हमारे शरीर मे उत्पन्न ज्वार भाटे से कुछ कैंसर कोशिकाएं उत्प्रेरित होने लगती हैं बाद मे फिर ए कोशिकाएं शान्त हो जाती हैं।(ज्वार भाटा पुर्णमासी को चन्द्रमा के गुरुत्व खिचाव से जल के सरफेस तनाव से उत्पन्न होता है पृथ्वी पर उपस्थित हर जल पर इसका असर होता है परन्तु जल की मात्रा कम होने पर हमे पोखरे और मटके के पानी मे ज्वार भाटा दिखता नही है। हमारे शरीर मे दोतिहाई जल है उसमे भी सरफेस तनाव होता है उस समय )। परन्तु कभी कभी ए कैंसर कोशिकाएं शान्त ना होकर हमारी कोशिकाओं पर इंपोज होने लगती हैं और कोशिकाओं को म्युटेट करके कैंसर फैलने लगता है।
इसलिए पूर्ण मासी से एक दिन पहले हम ब्रत सुरू करते हैं ।तब हमारे शरीर को ऊर्जा नही मिलती है ऐसे मे हमारा शरीर इन तीन दिनो तक अपनी ऊर्जा की जरूरत इन उत्प्रेरित कैंसर कोशिकाओं को खाकर पूरा करता है। और एक महीने के लिए हमे इस कैंसर नामक दुश्मन से निश्चिंत कर देता है। इसी प्रक्रिया को जापानी वैज्ञानिक डाक्टर यासुरी ने अटो फैगी नाम देकर हमारी प्राचीन विधा अपनाकर नोबेल झटक लिया । और हम अपनी सनातन सभ्यता को गरिया गरिया कर बहुत विज्ञानवादी और चूतिया रूपी आधुनिक बनते फिरते हैं।
रजनीश मिश्र

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