अल्पसंख्यक समाज का बहुसंख्यक पे शासन

एक 'असहिष्णु अल्पसंख्यक समाज' किस प्रकार से एक 'सहिष्णु बहुसंख्यक समाज' पर शासन करता है और न सिर्फ शासन करता है बल्कि उसे घुटनों पर ले आता है इसका सबसे अच्छा उदाहरण लॉक डाउन के समय नवरात्रि और रमजान पर सरकार और प्रशासन के रवैये को देखकर समझा जा सकता है।

प्रशासन को यह विश्वास था कि हिन्दू समाज किसी भी नई परिस्थिति में स्वयं को ढाल लेगा और देशहित और समाजहित के लिए अपनी व्यक्तिगत आस्था और मान्यता को तिलांजलि दे देगा ।ऐसा उसने इस बार लॉक डाउन के समय आए नवरात्रि के पर्व पर किया भी।

परंतु यह विश्वास प्रशासन को मुस्लिम समुदाय के बारे में नहीं था ।उसे मालूम था कितनी भी सख्ती कर ली जाए लॉक डाउन के समय आए रमजान में मुस्लिम समाज किसी भी नियम का पालन नहीं करेगा । वास्तव में रमजान में छूट देकर प्रशासन ने मुस्लिम समुदाय के साथ अपने संभावित संघर्ष को ही टाला है। ऐसा कर प्रशासन ने अपनी इज्जत बचा ली है।

इससे आगे जाकर रमजान के समय न सिर्फ नियमों में छूट दी गई है बल्कि क्वॉरेंटाइन में रखे गए मुस्लिमों के लिए इफ्तार और सेहरी के विशेष प्रबंध भी किए गए हैं लेकिन इसके उलट नवरात्रि के समय क्वॉरेंटाइन में रखे गए नवरात्रि के व्रत रखने वाले हिंदुओं के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई। क्योंकि प्रशासन को यह विश्वास था कि हिंदू इसे आपातकाल मानकर अपने लिए कोई अलग व्यवस्था की मांग करेगा ही नहीं और ऐसा उसने किया भी।

यह समझना आवश्यक है कि सरकार और प्रशासन की अपनी एक 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' होती है। प्रशासन लिखे हुए कानूनों से कम और अपनी इसी 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' से ज्यादा चलता है ।पिछले 73 वर्षों में मुसलमानों ने सरकारों की इस 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' में अपना एक विशिष्ट चरित्र और उस आधार पर अपने लिए विशेषाधिकार को गहरे तक बैठा दिया है।

इसलिए सरकार कोई भी आए उसका मुस्लिमों के प्रति रवैया इसी 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' से प्रेरित रहता है और कमोबेश एक जैसा ही रहता है। मुस्लिम समाज इस 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' को बनाए रखने के लिए जी तोड़ मेहनत करता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मुस्लिमों के प्रति सरकार और प्रशासन की इस 'इंस्टिट्यूशनल मेमोरी' को तोड़ा जाए परंतु दुर्भाग्य से अब तक की सभी सरकारों ने मुस्लिमों के प्रति इस 'इंस्टीट्यूशनल मेमोरी' को पोषित ही किया है।

एक 'असहिष्णु अल्पसंख्यक समाज' एक 'धर्मनिरपेक्ष सरकार' से अपने लिए धार्मिक आधार पर अलग नियम बनवाता है और अपने संगठित गिरोह की ताकत पर उसे बहुसंख्यक समाज को भी मानने को विवश कर देता है।

लड़ाई वहां है ही नहीं जहां आप इसे देख और समझ रहे हैं। लड़ाई आपके मस्तिष्क और अवचेतन मनों में है और वहीं आपको इसे लड़ना भी पड़ेगा। 

रजनीश मिश्र
शोधछात्र-काशी हिंदू विश्वविद्यालय

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